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रविवार, 23 फ़रवरी 2014

वाह टिप्पणियां , आह टिप्पणियां ………

 

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पोस्टों और टिप्पणियों को सहेज़ने में मुझे विशेष आनंद आता है इसलिए समय मिलते ही मैं कभी पोस्ट लिंक्स को संजोने के बहाने तो कभी पाठकों की टिप्पणियों को यहां इस पन्ने पर टिकाने के बहाने उन्हें संभाल लिया करता हूं । पिछले दिनों पोस्टों पर आई कुछ चुनिंदा और रोचक टिप्पणियां ये रहीं देखिए

रेल बाबू की इस डागदरी वाली पोस्ट पे आत्मा जी बेचैन होकर बोले

  • देवेन्द्र पाण्डेय

    आपका यह प्रयास प्रशंसनीय है। कुछ ज्ञान बढ़ा, कुछ अगली कड़ियों में बढ़ने की उम्मीद जगी है।
    बचपन से ऐसे माहौल में रहा हूँ कि ये सब बातें कानों में पड़ी हैं मगर कभी ध्यान से न सुना न सुनने के बाद स्मरण ही रहा। बचपन से ही आयुर्वेद एक दीर्घसुत्री इलाज की तरह लगा। बीमार हुआ तो वैद्य जी बोलते.. 7 दिन के लिए भोजन बंद! अंग्रेजी डाक्टर चार टेबलेट देता और बोलता..सब खाओ! अब आप ही बताइये किसके प्रति छवि अच्छी बनेगी? दवा बनाना भी धैर्य और झंझट का काम है। एक लीटर पानी को एक छोटी कटोरी होने तक उबालते रहो..।
    ...अब आपके कारण रूचि जग जाय तो धन्य भाग।

    1. प्रवीण पाण्डेय

      आठ कटोरिया जल आयुर्वेद को बनारस की देन है, ८ भाग जल जब उबलते उबलते एक भाग हो जाये तो उसमें अद्भुत औषधीय गुण होते हैं और तेज ज्वर में काम आता है। ज्वर के समय भोजन करना है कि नहीं, इसका विस्तृत वर्णन वाग्भट्ट ने किया है। ज्वर में ऊष्मा होती है और वह पित्त भड़कने से होता है। पित्त भड़कने में भोजन करते रहेंगे तो निदान अव्यवस्थित और दीर्घकालिक हो जायेगा। रोग को जड़ से उखाड़ना है, और बिना साइड इफेक्ट के तो उपवास उचित है। साथ में यह भी बताया गया है कि निर्जल कभी न रहें, पानी पीते रहें, वह पदार्थ खायें जिसमें पित्त का उपयोग न्यूनतम हो। इतना खायें कि निर्बल न हो जायें, क्योंकि रोग ले लड़ने के लिये शक्ति चाहिये। टैबलेट प्रभाव दबा देती है, मूल में नहीं जाती है, यही अन्तर है जो तात्कालिक और दीर्घकालिक है।

    2. देवेन्द्र पाण्डेय

      हम्म..

     

     

    आगे बढे तो देखा अमित जी अपने ब्लॉग पर कबूतर फ़ोन लगाए बैठे हैं , नंबर डायल और डिस्पले करते जिन्होंने पाया उन्होंने कहा

     
    1. शिवम् मिश्रा

      बाकी बातें बाद मे .... सब से पहले तो यह बताइये आप ने भाभी जी का मोबाइल उठाया ही काहे ... अच्छा उठाया तो उठाया ... पूरी जासूसी भी कर ली ... अच्छा जासूसी की तो की ... उस का फोटो भी ले लिए ... अच्छा फोटो लिए तो लिए ... उस को पोस्ट पर भी लगा दिया ... जे बात ठीक नहीं है !!

      प्रत्‍युत्तर दें

    2. Onkar

      बिल्कुल सही कहा

       

    3. Abhilekh Dwivedi

      हाहाहा! बहुत सही बात है और कई लोग ऐसा करते भी है। अच्छा लगा पढ़ कर!


    मास्टरनी पांडे ने जैसे ही दिल्ली की सियासी उठापटक को निशाना बनाते हुए अपनी पोस्ट पर खरी खरी सुनाई , उस पर आई प्रतिक्रियाएं देख कर ही पता लग गया कि तीर सही निशानों पर लगा है ।

  •  

  • Raj Shukla

    शेफाली जी,
    शब्द नहीं हैं मेरे पास, जो आपने लिखा है बिलकुल वही मेरे अन्दर चल रहा है, बेहद सुंदर प्रस्तुति और करारा जवाब दिया है आपने उस भगौड़े और कायर केजरीवाल को जिसने सोचा की वो लोगों के लिए लड़ेगा और हम उसे लड़ने देंगे और खुलेआम आम आदमी की जीने देंगे, उसको कोई हक नहीं है हमारी रोज़मर्रा की तकलीफों को राष्ट्रिय मुद्दा बनाने का... क्या सोचा उसने की हम विरोध नहीं कारेंगे? क्यों नहीं करेंगे? जरूर करेंगे...और जबतक उसको भ्रष्टाचारी, भगौड़ा और देशद्रोही साबित नहीं कर देंगे तबतक चैन से नहीं बैठेंगे।

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  • jeewan rawat

    ये एक धोखा है .
    हमको ऐसा CM नहीं चाहिए जो आरोप लगाये और भाग जाये.
    आरोप आप पर भी लगे हैं और आपने भी उनका जवाब नहीं दिया .
    आपको ५ साल सरकार चलने का मौका मिला था आप लोकसभा देखने निकल पड़े .
    क्या जनलोकपाल अगले 2 महीनो में तरीके से नही आ सकता था .?
    और भी काम थे केजरीवाल जी .
    आप मानो न मानो आप भले ही बाते आम आदमी की करते हो पर आपकी नीयत भी अच्छी नहीं है करम भी अच्छे नहीं हैं.
    आपने ईमानदारी और बेमानी का सर्टिफिकेट देने की दुकान खोल रखी है.
    आपके पास साबुत हैं तो जैल क्यों नही भिजवाते इन लोगो को.
    या ऐसे आरोप आप पर भी लग सकते हैं की आपने जो सब्सिडी के नाम पे बिजली कम्पनियों को पैसा दिया है उसमे ५०% कमीशन आपका भी है.
    आप साबित करो ये गलत है.
    आप पर से आम जनता का ही भरोसा उठ गया है. जिसके नाम की आप राजनीती करते हो.

  •  

    विवेक रस्तोगी जी अपने घर परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने में मशगूल होते हुए भी आसपास के प्रेम कपल पर आंखों का डंडा फ़टकारते हुए जैसे ही इस पोस्ट पर नूमदार हुए,
    झट्ट से पीडी ने टीपते हुए कहा

     

  • PD

    मोरल पुलिसिंग के मैं सख्त विरोध में हूँ. जब तक भारतीय संविधान के मुताबिक उनकी हरकतें अश्लीलता के अंतर्गत नहीं आता है तब तक उन्हें सड़कों पर प्रेम करने का उतना ही अधिकार है जितना मुझे या आपको सड़कों पर दोस्तों के साथ हंसी ठठ्ठा करने का..

  •  

     

    विख्यात पत्रकार ब्लॉगर रविश कुमार NDTV प्राइम टाईम वाले आज अपने कस्बे में अरविंद केजरीवाल की सरकार के जाने के बाद के हालात और अनुभवों पर साझा की गई बातों पर प्रतिक्रिया देते हुए पाठकों ने अपने बहुत सारे अनुभव साझा किए हैं



    Anita Jha

    रवीश क्या इसके लिए हम सब कही न कही जिम्मेदार नहीं है | मुझे तो लगा मै हु और सच कहु तो ट्विटर भी इसलिए ज्वाइन किया था | पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि एक चकविहू रचा जा रहा था AAP के खिलाफ | पर हो सकता है शायद ये मेरी सोच हो कही न कही मै अपने आप को AAP का ब्लाइंड supporter मानती हु | मेरे घर में लोग एहि कहते है | पर ट्विटर पर तो लोगो का जुलुम है आप के पक्ष मै | और वो आप आप हो गया |
    अभी कुछ दिन पहले लखनऊ शताब्दी मै थी | फर्स्ट क्लास डब्बे मै | कही न कही हम इस डब्बे के लोगो को सभ्य और सुशिल मानते है | एक आदमी ने बात शुरू की एक पार्टी को लेकर सब उसी के साथ हो लिए | सोचा बोलना बेवक़ूभी है जिसका जो विचार है वो रहेगा ही क्यों अपना माथा खपाऊ | पर कुछ देर बाद नहीं रहा गया जब एक आदमी ने ये दलील दी की अरविन्द केजरीवार सोमनाथ भारती को इसलिए नहीं हटा रहे है की उसने अरिवंद का एक विडिओ बना रक्खा है और उससे उसे बल्कमैल कर रहा है | अरविन्द उसे कभी हटा ही नहीं सकता | अपने आप को रोक न सकी पूछ ही डाला आपको ये खबर कहा से मिली | बोले व्हाट्सप्प पर आया था | मेरा पास भी सुबह से शाम व्हाट्सप्प से एसी मेसेज आते है पर मै तो ऐसा नहीं मानती | अपनी बात को रखती गई दलील देती गयी | जब बोलना सुरु कर ही दिया था तो रुकना क्या | पर देखा लोग मुझे सुन रहे थे और कुछ धीरे धीरे मेरी बातो को मनाने भी लगे | मेरा स्टेशन बीच मै था | कहा अब उतरना है - देखा सबकी निगाह मेरी तरफ थी | एक बुजुर्ग से आदमी ने जो की इस दौरान बिल्कुक चुप था ने कहा - मम आप उतर रही है अच्छा लगा आपको सुनकर | एक अजीब सी संतुस्ठी मिली | हमेशा ट्रैन से चुप चाप उतर जाती थी पहली बार सबको बाय बोला और जबाब भी मिला | उस दिन से जब मौका मिलता है बोलती हु | किसी पार्टी के खिलाफ नहीं पर अपने कुछ तथयो पर |
    मै जहाँ काम करती हु उसके आज कल के प्रेसिडेंट एक बहुत ही बड़े अख़बार के मालिक है |उनकी बातो में AAP की खिलाफत बिलकुल झलकती है | बुरा नहीं लगता है क्योकि लोकतंत्र है सबको अपनी बात रखने का अधिकार है | पर बुरा तब लगता है जब वो बोलते है और लोग उनकी हा में हा मिलने के लिए कुछ भी उलूल जलूल तथेय पेश कर देते है | पिछली मीटिंग में जब सुनते सुनते नहीं रहा गया तो मैने अपने बात की शुरुआत मजाकिया तरीके से की , सर में तो आप की ब्लाइंड सुप्पोर्तेर हु !!!! अरविन्द केजरीवाल कुछ भी करता है मुझे अच्छा लगता है | एकदम गुस्से में आ गए और बोले आप जैसे लोग ही स्टेबल गवर्मेंट नहीं बनने देंगे | और फिर वही हा में हा | क्या ये स्टेबल गवर्मेंट इतना इम्पोर्टेन्ट है की इसके लिए हम अपने विचार से अलग हो जाये ? अभी सब जगह एक स्टेबल गवर्मेंट का नारा चल रहा है | और ये में अपने पर्सनल एक्सपीरियंस से कह रही हु | जिन लोगो की मै बात कर रही हु वो उच्च मधयम वर्ग या उच्च वर्ग के है | इनका असर मधयम वर पर साफ पड़ रहा है | कहते है न सौ बार बोला झूठ सच हो जाता है |
    अभी एक वोटर अवेयरनेस ड्राइव चलाया था | वोट डालने के लिए | लोग अजीब से सवाल करते थे | हम किसको वोट डाले ? आप अपनी समझ से डाले | ये शायद वो लोग थे जो भाषा और भाषण के प्रभाव में आ गए थे | moneyऔर mascle पॉवर के नहीं | अखबार पढ़े, टी वि देखिये, अपने आस पास की जानकारी रखे | पर क्या मेरा जवाव सही था ! बिलकुल नहीं | मीडिया के उस चेहरे को भी जानती हु जो मेकअप के पीछे बहुत ही घिनौना है | लोग कहते हम अपना वोट waste नहीं करना चाहते है | लोगो की नज़रो मै हारने वाली पार्टी को वोट नहीं देना चाहिए | जवाव तो देती की वोट waste नहीं होते है | हवा के साथ चलना हमेशा सही नहीं होता है | पर जवाव से खुद को संतुस्ठ नहीं कर पाती थी |
    पर सही कहु तो अरविन्द की स्ट्रेटेजी अच्छी लग रही है | हेड ऑन कोलिसिओं वाली | ईमानदार होना जितना जरुरी है उतना ही ईमानदार दिखाना | शायद वक्त के सात aap इसमे निपुण हो जायेगे | जो भी हो अपनी बात को रख कर मे खुश हु | वैसे सुबह साढ़े नौ बजे से कम्पुटुर पर हु अभी ख़तम हुआ यह लिंक मेसेज के लिए तो ठीक है पर लम्बे लेख के लिए नहीं | काफी गलती होती है जिसे सुधरे मे वक्त लगता है | अगर आप इसमे कोई सुझाव दे सके तो कृपा होगी |
    आज छुट्टी है पर पता नहीं ऐसा लगता है छुट्टी मर्दो की लिए है | महिलो को तो इस दिन डबल काम | पुरे हफ्ते का काम इस दिन पर जो छोड़ देते है | समय मिला तो ब्लॉग पर भी आउंगी | लिखते रहिये पढ़ कर अच्छा लगता है |

     

     

    जानकीपुल पर हिंदी पुस्तकों के बैस्ट सेलर बनने और न बन पाने को लेकर, इस पोस्ट में  खडी की गई बहस पर आई टिप्पणियां बडी ही कांटे की लगी



     
    1. Sharad Shrivastav

      मुझे लगता है प्रभात जी ये हमारे पूर्वजो की देन है, वो ब्राह्मण शूद्र मे फंसे रहे, स्वर्ण दलित करते रहे। आज की साहित्यिक दुनिया मे गंभीर साहित्य, पोपुलर साहित्य का अंतर आ गया। लेकिन भाव वही है। वही भेदभाव, वही छुआछूत, जैसा आपने परसों कहा की गभीर साहित्य लेखक भी हैं सीक्रेट एडमायरर पाठक साहब के । सबके सामने कबूल नहीं कर सकते, इज्ज़त घटती है। हवाई जहाज मे अंग्रेजी नॉवल पढ़ते हैं। ताकि आसपास के सहयात्री हँसे नहीं। लेखक बनने से पहले इन सभी ने खूब पढ़ा लिखा होगा, क्या काम आया वो सब। ब्राहमनवाद से तो दूर आ गए लेकिन नए किस्म के ब्राहम्ण्वाद मे फंस गए। मैं ऊंचा तू नीचा। खून वही है, जज़्बात वहीं हैं । इन्हें कोई नहीं बदल सकता शरद

      Reply

    2. satyanarayan

      इस बात पर काफ़ी चर्चे होते रहे हैं कि हमारे समाज में समकालीन स्तरीय साहित्य का पाठक वर्ग काफ़ी सिमट गया है। आज भी हिन्दी में सबसे अधिक प्रेमचन्द पढ़े जाते हैं। कामतानाथ, रवीन्द्र कालिया, मैत्रेयी पुष्पा, नासिरा शर्मा, अलका सरावगी, संजीव, शिवमूर्ति, उदय प्रकाश आदि के चर्चित उपन्यासों के पाठक वर्ग का दायरा भी काफ़ी छोटा है। हर सामाजिक-सांस्कृतिक समस्या की तरह इस समस्या के भी कई कारण हैं। किताबों की ऊँची क़ीमतें, लाइब्रेरी-सप्लाई करके अंधाधुंध मुनाफ़ा कमाने की प्रकाशकों की अन्धी हवस के चलते आम लोगों तक पुस्तकों को पहुँचाने वाले किसी प्रभावी तंत्र का अभाव, इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रभाव के कारण आम पढ़े-लिखे लोगों की सांस्कृतिक अभिरुचि में आई गिरावट आदि को इस समस्या के कुछ स्थूल कारणों के रूप में देखा जा सकता है।
      इनके अतिरिक्त कुछ बुनियादी सामाजिक ऐतिहासिक कारण भी हैं। हमारे समाज के तीव्र पूँजीवादीकरण ने एक ऐसी मध्यवर्गीय आबादी की भारी संख्या पैदा की है जो बाज़ार-संस्कृति का अन्ध-उपासक और गैर-जनतांत्रिक प्रवृत्ति का है। कला-साहित्य-संस्कृति से न तो इसका कुछ लेना-देना है और न ही आम जनता के जीवन से। व्यापार-प्रबन्धन, बचत, निवेश और मौज-मस्ती आदि की इसकी अपनी दुनिया है जो शेष समाज से एकदम कटी हुई है। एक कारण यह भी है कि तमाम भौतिक प्रगति के बावजूद, हमारे समाज के आम लोगों की आँखों में आज वे भविष्य-स्वप्न नहीं हैं जो सामाजिक जीवन को आवेगमय बनाते हैं। यह समय गतिरोध और विपर्यय का समय है। सामाजिक मुक्ति की कोई नयी परियोजना अभी जीवन में हलचल पैदा करने वाली भौतिक शक्ति नहीं बन पायी है। इतिहास के ऐसे कालखण्डों में स्तरीय जनपरक साहित्य का दायरा प्रायः काफ़ी संकुचित हो जाया करता है। लेकिन इन कारणों से जुड़ा हुआ एक और कारण है जिसे हम यहाँ विचारार्थ अपने उन सहयात्री साहित्यकारों के समक्ष प्रस्तुत करना चाहते हैं जो साहित्य में कुलीनतावाद का विरोध करते हैं।
      .........
      हम विनम्रता, चिन्ता और सरोकार के साथ साहित्यक्षेत्र के सुधी सर्जकों का ध्यान इस नंगी-कड़वी सच्चाई की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं कि उस मेहनतकश आबादी की, जो देश की कुल आबादी के पचास प्रतिशत से भी अधिक हो चुकी है, ज़िन्दगी की जद्दोजहद समकालीन हिन्दी साहित्य की दुनिया में लगभग अनुपस्थित है। आप याद करके ऐसे कितने उपन्यास या कहानियाँ उँगली पर गिना सकते हैं जिनकी कथाभूमि कोई औद्योगिक क्षेत्र की मज़दूर बस्ती और कारख़ानों के इर्दगिर्द तैयार की गयी हो, जिनमें हर वर्ष अपनी जगह-जमीन से उजड़ने, विस्थापित होकर शहरों में आने और आधुनिक उत्पादन-तकनोलॉजी में आने वाले कारख़ानों में दिहाड़ी या ठेका मज़दूर के रूप में बारह-बारह, चौदह-चौदह घण्टे खटने वाले नये भारतीय सर्वहारा के जीवन की तफ़सीलों की प्रामाणिक ढंग से इन्दराजी की गयी हो। और इनके पीछे की कारक-प्रेरक शक्ति के रूप में काम करने वाली सामाजिक-आर्थिक संरचना की गति को अनावृत्त करने की कोशिश की गयी हो? सच्चाई यह है कि जो मज़दूर वर्ग आज संख्यात्मक दृष्टि से भी भारतीय समाज का बहुसंख्यक हिस्सा बन चुका है, उसका जीवन और परिवेश जनवादी और प्रगतिशील साहित्य की चौहद्दी में भी लगभग अनुपस्थित है। मज़दूर वर्ग और समाजवाद के प्रति रस्मी, दिखावटी या पाखण्डपूर्ण प्रतिबद्धता का भला इससे अधिक जीता-जागता प्रमाण और क्या हो सकता है?

     

     

     

    चलिए आज के लिए इतना ही , कीप ब्लॉगिंग एंड कीप टिप्पणिंग ………

    शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

    श्श्श्श्श्श्श्श्श कुछ कह न देना ……

     

    जानने वाले ये बात बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि मैं स्वभाव से जुनूनी किस्म का व्यक्ति हूं और जिस काम को हाथ में लेता हूं मेरी पूरी कोशिश होती है कि अपनी सर्वाधिक क्षमता और उर्ज़ा उसमें लगा दूं , फ़िर चाहे वो किताबें पढना या ब्लॉग लिखना , दफ़्तर में सरकारी काम काज को निपटाना हो या छत पर पडी क्यारियों में पौधों फ़ूलों का हाल चाल लेना । नए साल में और कुछ नया हुआ या नहीं ये तो पता नहीं मगर यकायक यूं लगने लगा है मानो पढने लिखने का वो मौजू मूड फ़िर अचानक से जाग्रत हो चुका है । कभी एक साथ दर्ज़न भर ब्लॉग्स पर लगातार लिखते रहने , पढने और टिप्पणी करने वाला मेरे जैसा ब्लॉगर भी पिछले वर्ष बेहद उदासीन रहा था ,ब्लॉग लेखन से और पढने से भी ,बहुत बार की कोशिशों के बावजूद भी , मगर अब लगने लगा कि पुरानी पटरियों पे ही अपनी रेल दौडने लगी है । मुझे पोस्टों और पोस्टों की टिप्पणियों को पढने में जितना आनंद आता है उतना ही उन्हें सहेज़ने में भी आता है । एक लंबे अर्से तक अपने ब्लॉग झा जी कहिन , पर दो पंक्तियों में पोस्टों के लिंक संजोने का लुत्फ़ खूब उठाया था मैंने ,शायद आपको फ़िर वही रफ़्तार देखने को मिले , चलिए फ़िलहाल तो आपको कुछ चुनिंदा टिप्पणियां पढवाता हूं ……………………….

     

    काव्य मंजूषा जी ने अपने ब्लॉग पर जैसे ही झंडे की कहानी सुनाई उस पर सलिल दादा ने टिप्पणी दी

     
    1. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

      कहीं से लिए गए हों... ये ऐसे तथ्य हैं जिन्हें पढ़ते हुए गर्व भी होता है और हर बार लगता है कुछ नया पढने को मिला। लेकिन यह पोस्ट अगर गणतंत्र दिवस के आस पास होती तो और अच्छा होता।
      झंडा ऊंचा रहे हमारा।


     

    हिंदी ब्लॉगर रश्मि रवीज़ा अपनी पोस्टों में अक्सर हमसे आपसे और समाज से जुडे मुद्दों को निशाने पर लेती रही हैं । बहुत ही कमाल की पोस्ट में उन्होंने समाज की “कैसी कैसी रस्मों” का ज़िक्र किया तो कितनी दिलचस्प टिप्पणियां आईं देखिए


  • अन्तर सोहिल

    मैनें तो आजतक पत्नी को भी मेरे पैरों को छूने नहीं दिया है। शादी के तुरंत बाद एक रस्म हुई थी ससुराल में जिसमें वहां की एक काम वाली "नाईन" ने मेरे पैरों को धोया था। उनकी उम्र देखकर मेरे पैरों को हाथ लगाना मुझे आजतक शर्मिंदा कर देता है। थोडा विरोध भी किया, लेकिन बुजुर्ग ससुरालियों के सामने नहीं चली।
    प्रणाम

     

  • Digamber Naswa

    मेरे को तो कई रस्में आज के समय अनुसार उचित नहीं लगतीं और इनका विरोध होना ही चाहिए ... मेरा तो मानना ये भी है की इसकी शुरुआत लड़के को ही करनी चाहिए क्योंकि आज भी हमारा समाज पुरुष समाज ही ज्यादा है और उन्हें ही आगे आना चाहिए ...

     

  • Shekhar SumanJanuary 30, 2014 at 12:37 AM

    हमारे यहाँ तो नहीं धोये जाते, कबकी बंद हुयी ये रस्म... जाने किसने आवाज़ उठाई हो...
    दीदी, मैंने अपने यहाँ कभी बारात आती नहीं देखी अब तक... अब दूर-दूर तक कोई बहन ही नहीं तो देखें कहाँ से.... हाँ अपने भाइयों की शादियों में ऐसी रस्म नहीं हुयी थी ये याद है अच्छे से....
    वैसे बारात निकलने से पहले दूल्हा अपने मुंह से आम के पत्ते का डंठल काटता है और उसकी माँ को उन झूठे ठंठलों को खाना पड़ता है.... ये रसम बहुत अजीब लगी थी.... सोच कर रखा है कि ये रस्म नहीं होने दूँगा चाहे जो हो जाये...
    वैसे आपकी बात से सहमत हूँ कि शादियों में दूल्हा-दुल्हन के साथ साथ उनके माता-पिता भी ऐसे धुन में रहते हैं कि आस-पास वाले जो भी रस्म याद दिलाते जाएँ वो होती रहती है... कोई मैनिफेस्टो तो बंता नहीं, जिस भी रिश्तेदार को जो रस्म याद आ गयी, करवा दिया....

     

  • स्वप्न मञ्जूषा

    इतनी 'बोकवास' रस्म का अंत होना ही चाहिए :)
    वैसे मेरे घर में ये रस्म नहीं हुई क्योंकि 'मोका' ही नहीं मिला न !
    लेकिन सोच रही हूँ, अगर ऐसा होता तो, 'मेरे इनके' पाँव, मेरे बाबा छूते, क्यों भला ? अब इतनी भी अच्छी शक्ल नहीं है इनकी :)
    ये तो हुई मजाक की बात, लेकिन ये रस्म वाक़ई किसी भी हिसाब से सही नहीं है, बड़े-बुजुर्गों से अपने पाँव छुवाना ? अब इतनी तो अक्ल लड़कों में खुद ही होनी चाहिए कि वो खुद मना करें, अब हर बात उनको बतानी पड़ेगी क्या ? मेरी सास मेरी पाँव छुवे क्या मेरे पतिदेव बर्दाश्त कर लेंगे, नहीं न ?? तो फिर ?? अब ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने घरों से इस वाहियात रस्म को ख़तम करने की शुरुआत करें । मेरे बेटे की शादी में ये रस्म पूरी तरह से बॉयकाट होगा, पक्की बात है ।

     

     

    सोचालय पर फ़िलहाल सिसकी मिली और उस पर कुछ यूं टीपा गया

     

    1. NAJanuary

      deja vu.
      ये घट चुका है तुम्हारे साथ पहले। फिर कब सम्हलोगे?
      ---
      वो अफसाना जिसे अंजाम तक पहुंचाना न हो मुमकिन...उसे एक फिलहाल तलक ठहराये हुये रखना?
      तुम्हारे खत खुदा के दरवाजे तक पहुंचते हैं...कह दो एक रोज सारा कुछ...
      पढ़ा है तुम्हें, जिया है तुम्हें, सोचा भी है दिन के कई पहर...हो ये भी तो सकता है कि कोई बस उतने भर के लिये था। तकलीफ जितनी उसने दी है, तुमने दामन फैलाये मांगी भी तो थी...वो जो खुदा बोल के बैठा है उपर। उससे कितने सवाल करोगे? रो रो के समंदर भर दो और फिर खाली दिल और दामन लिये उस किनारे से लौट आओ।
      दोस्त, हम जन्म से अकेले हैं। उदास क्षणों में तो और भी। इतने दिनों से किसी को पढ़ते रहने पर कुछ हक बन जाता है।
      सुनो, एक गीत सुनो...
      धारा जो बहती है, मिलके रहती है
      बहती धारा बन जा...फिर दुनिया से बोल
      http://www.youtube.com/watch?v=pGYjHQbV1KE
      सुनो, मुस्कुरा दो जरा। तुम्हारी सिसकी चुभती है बहुत।



    शिखा जी ने अपनी पोस्ट में जिद्दी जिंदगी का ज़िक्र किया तो उसपर कहा गया

    1. शिवम् मिश्रा

      "जिंदगी बहुत जिद्दी और एगोइस्ट किस्म की होती है. उसे ज़रा सा लाइटली लेना शुरू करो तो तुरंत पैंतरा बदल लेती है."
      ज्यादा सीरियसली ले लो तो कौन सा रहम खा लेती है ... पैंतरा तो तब भी बदलती ही है न ... क्यों ??

     

    दीपिका रानी

    एक थ्रिलर है ज़िन्दगी... जिसके हर मोड़ पर कुछ न कुछ हमें हैरान कर जाता है.. यही इसकी ख़ासियत भी है। कितनी बोरियत भरी होती ज़िन्दगी अगर वह टिपिकल बॉलीवुड स्टाइल की फिल्म होती.. जिसका अंत हर कोई प्रेडिक्ट कर लेता है।

     

    रचना त्रिपाठी अपनी इस पोस्ट में कमाउ बीवियों के लिए कुछ कह बैठीं , प्रतिक्रियाएं देखिए

     

     

     
    1. अनूप शुक्ल

      युवक की सोच तरस खाने लायक ही है।
      समय बदल रहा है। सोच भी बदल रही है। आने वाले समय और बेहतर होगी सोच।
      अच्छा लेख !
      वैसे

       

    इष्ट देव सांकृत्यायन

    बुनियादी तौर पर हमारा समाज स्त्रियों के अर्थोपार्जन के ख़िलाफ़ नहीं रहा है. ऐसा होता तो वेदों में तमाम स्त्री ऋषि नहीं होतीं और न बाद के दौर में गार्गी, मैत्रेयी विदुषियों का ही उल्लेख मिलता. लेकिन पीछे का क़रीब दो हज़ार साल का विदेशी आक्रमणों का दौर पहले हमें मजबूर और बाद में कूढमगज बनाता गया. ये वही लोग हैं, जो अभी तक 2000 हज़ार साल पीछे ही अटके हुए हैं. उससे आगे बढ़ने के लिए तैयार नहीं हैं. क्योंकि इनमें आत्मविश्वास नहीं है.

     

    1. arvind mishra

      कमाऊ स्त्रियां पुरुष की बराबरी का दावा करती हैं -इगो क्लैस होते रहते हैं -
      और जब पुरुष निठल्ला हो और उसकी स्त्री कमाऊ तब तो वह पुरुष बेचारा तो भीगी बिल्ली हो रहता है -हींन भावना से ग्रस्त भी
      हाँ पुरुष और स्त्री दोनों का स्तर बराबर हो तो फिर हींन भावना नहीं आती किसी में भी।
      श्रोत=स्रोत

       

    smt. Ajit Gupta

    अब समाज तेजी से बदल रहा है, लेकिन फिर भी यह मानसिकता कहीं दिखायी दे ही जाती है। धीरे-धीरे इसमें भी बदलाव आ जाएगा।

     

    डॉ टी एस दराल जी ने अपने ब्लॉग अंतर्मंथन पर , अपनी बालकनी पर आ बैठे कबूतर को ये पोस्ट समर्पित की तो उस एक रोचक प्रतिक्रिया ये आई ,

    expression

    मुझे कबूतर कभी कभी थोड़े स्टुपिड से लगते हैं....खोजबीन करती हूँ उनके कुछ अटपटे/अनमने व्यवहार पर...
    हालांकि trained किये जा सकते है ये,इसलिए stupid होते तो न होंगे....
    nice click....nice post as always!!
    regards
    anu

     

     

    1. डॉ टी एस दराल

      अनु जी , सफेद कबूतर ट्रेन किये जा सकते हैं . लेकिन जंगली कबूतर तो हमे भी स्टुपिड ही लगते हैं .

     

     

    सत्यार्थमित्र जी ने अपनी पोस्ट में एक विचलित करने वाली रिपोर्ट प्रस्तुत की तो उस पर ये टिप्पणियां आईं

     

  • sadhana vaid

    प्राथमिक स्तर पर बच्चों को फेल ना करने का निर्णय भी इस शोचनीय स्थिति को और गंभीर बनाता है ! यह बच्चों व अध्यापकों को अकर्मण्यता के लिये प्रेरित करता है ! यह निर्णय केवल साक्षरों की संख्या के आंकड़ों को बढ़ा चढ़ा कर दिखाने और अपनी पीठ थपथपाने जैसा है ! वे वास्तव में साक्षर हुए भी या नहीं इसकी चिंता किसीको नहीं है ! विचारणीय आलेख !

    Reply

  •  

  • स्वप्न मञ्जूषा

    सिद्धार्थ जी,
    अभी कम से कम आपको आँकड़े तो मिल रहे हैं, अगर यही हाल रहा तो सही आँकड़े बताने वाले भी नहीं मिलेंगे।
    मेरी माँ स्कूल इंस्पेक्ट्रेस थीं, उनके साथ कई स्कूलों में जाने का मौका मिला था । मैंने फर्स्ट हैण्ड सो कॉल्ड शिक्षकों के हाथों शिक्षा की दुर्गति होते देखी है.।
    लीजिये पेश है एक विडिओ जो बिहार के एक स्कूल का है, और ऐसे शिक्षक/शिक्षिका आपको अनगिनत स्कूलों में थोक के भाव में मिल जायेंगे।
    अभी दो महीने पहले एक आँगन-वाड़ी स्कूल में जाने का मौका मिला, हैरान हो गई देख कर, सरकारी पैसे का दुरूपयोग कैसे-कैसे किया जाता है ।
    http://www.youtube.com/watch?v=nafddfj2mXQ

    रविवार, 8 सितंबर 2013

    पोस्ट पढ लिए न , अब टिप्पणियां पढिए

    आम तौर पर ब्लॉग पाठक ,पोस्ट पढते हैं , बहुत नहीं भी पढते हैं , मगर अब हम जैसे ब्लॉग दीवानों को कौन समझाए और क्यूं समझाए , शायद पोस्ट तो पोस्ट टिप्पणियों तक को न सिर्फ़ पढने बल्कि अलग अलग पन्नों पर सहेज़ने का ये जुनून ही है कि  ब्लॉगिंग की दुनिया में सात साल कब पूरे हो गए पता ही नहीं चला । चलिए छोडिए ये बातें फ़िर कभी , फ़िलहाल तो आपको दिलचस्प पोस्टों में की गई कुछ कमाल की टिप्पणियां पढवाता हूं ……………..

     

     

    image

     

     

     

    अनूप शुक्ल जी के ताज़ा पोस्ट पर टीपते हुए एक "पाठक" नहीं नहीं एक" झा" कहते हैं

    sanjay jha

    1. sanjay jha

      वाओ…………

      @ ’जरको’…………….क्या कहिये’ ???

      @पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना,

      फ़िर जलते हुये शहरों में पानी बेचना।……..मार डाला?????

      प्रणाम.

    और दूसरे पाठक कहते हैं 

    1. देवेन्द्र बेचैन आत्मा

      देवेन्द्र बेचैन आत्मा

      आज आपके व्यंग्य की मिसाइल एकदम सही ठिकाने पर लगी है- वाऊ।

      बहुत दिन बाद इत्ता जोरदार पढ़ने को मिला आपके की बोर्ड से या हो सकता है यही मुझे अधिक अच्छा लगा हो !

    अपनी इस पोस्ट पर ब्लॉगर रचना एक तीखा सवाल उठाते हुई पूछती हैं कि क्या बलात्कारी को सज़ा ऐसे भी दी जाती है

    टिप्पणी आती है

    1. अली सैयद

      कैसी बेहूदगी है ये ? किसे सजा दी है उन्होंने ?

      अमूमन सारी जातीय पंचायते पुरुष प्रभुत्व वाली होती हैं उनमें स्त्रियों की भागीदारी लगभग शून्य होती है अस्तु इस तरह के फैसले एक विशिष्ट तरह की मानसिकता का संकेत देते हैं ! इन एकपक्षीय एकांगी अतार्किक निर्णयों को न्याय नहीं कहा जा सकता !

      1. रचना

        अली जी आप को क्या लगता हैं इस बेहूदगी के पीछे कारण क्या हैं , किस सोच / मानसिकता के तहत ये निर्णय लिया गया होगा। एक इंग्लिश ब्लॉग पोस्ट पर बड़े सारे कारण लोगो ने इंगित किये हैं मै चाहती थी हम भी कुछ कारण इंगित करे बाद में , उस पोस्ट का लिंक भी दूंगी

    काजल भाई के इस कार्टून पर

    कार्टून :- मर्द को दर्द नहीं होता ?

    पर टीपते हुए ताउ फ़रमाते हैं :



    ताऊ रामपुरियाअकेले डंडे से ये भी क्या कर लेगा? आखिर इनके भी बाल बच्चे हैं.
    रामराम.

     

     

    डा. साहेब , अपने विषयों में आजकल कभी यौन शिक्षा की क्लासेस दे रहे हैं तो कभी कुछ और आज वृद्धावस्था का प्रेमालाप खैंच मारे हैं

     

    इस पर टीपते हुए पाठक क्या कहते हैं देखिए

     

     
    1. सतीश सक्सेना

      जिन सांसों में समाई थी यौवन की खुशबु
      अब गार्लिक पर्ल्स की गंध आती है ।
      क्या यार ..
      आशिकी का क्या होगा ?

     

  • कुशवंशSeptember 08, 2013 11:39 AM

    बेहतरीन कहा आपने
    वही
    " ये देखो हमारा शादी का फोटो ...
    हूँ .......तुमसे मच्छर ढूँढने को कहा था ना "

  •  

     

    लेकिन टिप्पणियों की बुमाबुम तो चालू हुई डॉ, अरविंद मिश्रा जी की इस पोस्ट पर जब उन्होंने पूरी हिंदी पट्टी के ब्लॉगरों को ही रगेद मारा

     

  • प्रत्‍युत्तर दें

  • Virendra Kumar Sharma

    वेबनर और वेब -नारी होना एक बात है सम्मेलनी होना दूसरी। जैसे हर कवि मंचीय नहीं होता वैसे ही हर ब्लोगर सम्मेलनीय नहीं होता है। अरविन्द भाई साहब की तारीफ़ करनी पड़ेगी-सबको आगे लाते हैं सबकी ख़ुशी में नांचते हैं सतो गुण बढ़ा रहता है इनमें इसीलिए दूसरे की प्रशंसा भी कर लेते हैं। हम एक मर्तबा जब मुंबई में थे इन्होनें ने हमें भी नै दिल्ली आने के लिए न्योता था अंतर -राष्ट्रीय ब्लागरी बैठक में। हमारे अन्दर वराह भगवान् का अंश ज्यादा रहता है (बोले तो तमोगुण जो आलस्य और प्रमाद का अधिष्ठाता है ),मन का आलस्य छाया रहा हम नहीं गए सो नहीं गए। वैसे तन से भी थोड़ा विकलांगई हैं। दस टंटे हैं अमरीका आते हैं तो हमेशा वील चेयर लेते हैं। अंग्रेजी संडास चाहिए हर जगह। बस कई किस्म के अवरोध आ जाते हैं। यात्रा कई मर्तबा दुष्कर लगती है जहाज हवाई में भी तन जुड़ जाता है २० घंटा उड़ान तौबा तौबा।

     

  •  

     

  • Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    बहुत अच्छी पहलहै यह संगोष्ठी।
    लेकिन यह प्रेशराइएशन कि जो नही जा सकते वे या तो घमंडी हैं /या उनमे आत्मविश्वास की कमी है /या वे संजीदा नही हैं /आदि आदि मुझे ठीक नही लगता।
    यदि किसिमे क्रियेटिविटी है और वह ब्लॉग लिख रहा / रही है तो यह उसका अपना निर्णय है। यदि वह संगोष्ठी में भाग ले सकता / सकती / भाग लेना चाहता / चाहती है / नहीं ले सकता / सकती.... यह हर व्यक्ति का व्यक्तिगत निर्णय है। हम में से अधिकाँश यहाँ या तो होबी के रूप में लिखते हैं या फिर वे महसूस करते हैं कि उनके पास कुछ है जिसे साझा करना उन्हें पसंद है। फिर कुछ लोग अपने राजनैतिक उद्देश्यों या अपनी महत्वाकांक्षाओं से। इनमे से किसी पर भी दबाव डालना कि उन्हें संगोष्ठी (यों) में सम्मिलित होना ही चाहिए / यह उनका कर्त्तव्य जैसा है - यह उचित नहीं।
    मेरे विचार में सिद्धार्थ जी के प्रयास प्रशंसनीय हैं ।लेकिन दबाव नहीं होना चाहिए किसी पर भी। सबकी अपनी जिंदगी और अपनी व्यस्तताएं होती हैं। कोई अपने आप को व्यस्त कह कर आपका अपमान नही करना चाहता हो और modestlyअपने आप को कम और आपको बड़ा कह कर सम्मान पूर्वक आपको मना किया हो तो उसे यहाँ सार्वजनिक मंच पर उस बात को लेकर व्यंग्य मुझे उचित नहीं लगता।

    1. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

      सहम्त हूँ आपसे। लेकिन मुझे नहीं लगता कि कोई जबरिया दबाव बना रहा है। :)
      इसे आप यूँ समझिए कि हम जैसे लोग कुछ ज्यादा उत्साही हो गये हैं इस माध्यम के प्रति तो उन्हें दूसरों की ‘साधारण रुचि’ या अन्यमनस्कता देखकर थोड़ी झुँझलाहट हो सकती है। मैं इसमें घमंड या आत्मविश्वास की कमी जैसी बात नहीं देखता। आदरणीय अरविंद जी थोड़ा भावुकतावश सेंटियाकर ऐसा कह गये होंगे वर्ना िस आभासी दुनिया में किसी का क्या अख्तियार है।
      मुझे तो एल.आई.सी. की टैग लाइन याद आती है- “बीमा आग्रह की विषय वस्तु है” बावजूद इसके कि बीमा कराने में आपका ही लाभ होगा कंपनी आपसे बार-बार आग्रह करती है। :)
      अब ये मत कहिएगा कि इसमें कंपनी का लाभ ज्यादा है क्योंकि ब्लॉगगोष्ठी से किसी को कोई निजी लाभ नहीं है।

    2. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

      सहम्त = सहमत

    3. arvind mishra

      @शिल्पा जी की टिप्पणियाँ मुझे जवाब देने को बाध्य करते हैं -
      मैंने महज हिन्दी अंग्रेजी ब्लागरों की तुलना की थी बस :-)
      सारी मजबूरियाँ , छद्म आत्मसम्मान,गलदश्रु और घरघुसपना केवल हिन्दी ब्लागरों के साथ क्यों ?

    4. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

      :)
      :)
      @@ सिद्धार्थ जी - मैं यह नहीं कह रही कि इसमें आयोजकों का कोई भी फायदा है - लेकिन यह कह रही हूँ कि आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति जो ब्लॉग्गिंग कर रहा हो वह संगोष्ठी में शामिल होने को अपना कर्त्तव्य माने - भले ही यह उसके लिए फायदेमंद हो तब भी :)
      @@ मिश्र सर - बिलकुल ऐसा नहीं है कि यह सब सिर्फ हिंदी ब्लोग्गेर्स के साथ ही होता हो - लेकिन डिग्री अधिक हो सकती है । जैसे मैं अपना ही उदाहरण लूं तो मैं ब्लोगिंग एक हॉबी की तरह करती हूँ - ब्लॉग पर भी जितना लिखना चाहती हूँ जितना पढना चाहती हूँ - उतने के लिए भी समय नहीं पूरा पड़ता - संगोष्ठी में जाना तो खैर मेरे लिए संभव ही नहीं। और ऐसी ही स्थिति कई और लोगों के साथ हो सकती है। इस तरह के दबाव मुझे अनुचित लगते हैं।

  •  

     

     

    सतीश सक्सेना जी के गीत हमेशा ही निशान छोडते हैं , आज अफ़गानों की छाती पर छोडे हैं , इस पर प्रतिक्रिया आई है

     

     

  • Majaal07

    साहब , हमें तो आपका ' निवेदन' सबसे प्रभावशाली लगा, हमारे हिसाब से आपकी रचनाओं का इससे अच्छा वर्णन नहीं किया जा सकता !
    रही बात रचना के पात्र की, तो इनका नाम पहेली बार ही सुना था फिर मालूम पड़ा की फिल्म ' एस्केप फ्रॉम तालिबान ' इन्ही के उपन्यास से प्रेरित थी . उपरवाली इनकी आत्मा को शांति और हिंसा फैलाने वालों को सद्बुद्धि दे ...
    लिखते रहिये .

  •  

    ब्लॉग जगत के अपने पांडे जी यानि प्रवीण पांडे जी पूछते हैं कि , अगला एप्पल कैसा हो ,  हमसे पूछते तो हम तो कहते , जैसा भी हो , ससुरा प्याज जैसा न हो , फ़िर एप्पल का एप्पल होने का क्या फ़ायदा , मगर इस पर पाठकों की राय ये रही

     

  • Devendra Dutta Mishra

    निश्चय ही मोबाइल व टैबलेट जगत में विगत कुछ वर्षों से कड़ी व्यावसायिक प्रतियोगिता के फलस्वरूप इनके विभिन्न ब्रांड के प्रोडक्ट, एप्पल या सैमसंग या एचटीसी या कोई अन्य, सभी में चमत्कारी व उच्चकोटि की गुणवत्ता व उपभोक्ता की सहूलियत में सुधार हुआ है, जो निश्चय ही अंततः उपभोक्ताओं हेतु सुखद व फायदेमंद है। मेरे समझ में तो अब सभी प्रांतों के लिए ही आगे की और सबसे कठिन चुनौती है बैटरी की ड्यूरेबिलिटी व प्रोडक्ट की वीयर व टीयर क्षमता,जैसे उपकरण के अचानक फर्श पर गिर जाने अथवा इसके दुर्घटना वश पानी में गिर जाने पर भी न्यूनतम हानि की अंदरूनी क्षमता ताकि मेरे जैसे लापरवाह उपभोक्ता, जो अपने उपकरण की हैंडलिंग में थोड़ा लापरवाह हैं, भी बेझिझक उपयोग कर सकें। मेरी समझ में नोकिया का अपने उपकरणों में इन पक्ष की मजबूती का अनुभव, नये प्रोडक्ट के डिजाइन सुधार में निश्चय ही काफी उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

  • मंगलवार, 26 जून 2012

    टिप्पणियां ...पोस्ट को ज़िंदा रखती हैं







    ब्लॉगिंग में जितना आकर्षण ब्लॉग पोस्टों का रहा है शुरू से लगभग उतना ही उन पर दर्ज़ टिप्पणियों का भी रहा है । और यकीन मानिए कभी कभी तो शायद उससे भी ज्यादा । वैसे भी मुझे तो जितना पोस्टें अपनी ओर खींचती हैं उतनी ही प्रभावित टिप्पणियां भी करती हैं । ऐसा लगता है मानो आजकल लोगों ने टीपना कम कर दिया है , लेकिन इतना भी कम नहीं किया कि ढूंढने से कमाल कमाल की टिप्पणियां न मिलें । जहां तक मेरी बात है तो मेरी तो कोशिश यही रहती है कि जितना आनंद पोस्ट लेखक को पोस्ट लिखने में आया हो , उतना ही आनंद उसे उस पोस्ट पर आई टिप्पणियों से भी आना चाहिए । सहमति -असहमति , आलोचना, प्रशंसा से इतर मूल बात ये कि टिप्पणियां पोस्ट को जिंदा रखती हैं । जैसा कि मैं पहले कह चुका हूं , इन दिनों मैंने पाया कि कुछ ब्लॉग्स पर टिप्पणियों का विकल्प बंद ही कर दिया गया है । कारण जो भी हो , किंतु ये कुछ कुछ इस तरह का लगता है मानो आपको कहा जा रहा हो , आइए पढिए और जाइए । हालांकि किसी अप्रिय स्थिति में मॉडरेशन सुविधा का उपयोग मेरे विचार से एक बेहतर विकल्प हो सकता है । खैर ये तो ब्लॉग संचालक की इच्छा , जिसका सम्मान किया जाना चाहिए । चलिए कुछ दिलचस्प टिप्पणियां पढवाते हैं आपको



    आज ललित शर्मा जी अपनी पोस्ट पर एक बहुत की कमाल की बात कहते हुए लिखा कि यदि ये नियम बना दिया जाए कि सभी सरकारी कर्मचारियों अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढेंगे लिखेंगे और इसे अनिवार्य नियम कर दिया जाए तो निश्चित रूप से सरकारी स्कूलों के स्तर में भी सुधार होगा । इस पर टिप्पणी करते हुए ,



    Ratan singh shekhawat ने कहा…
    बड़े निजी स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला अभिभावकों के लिए बच्चों की पढाई से ज्यादा अपना स्टेटस सिम्बल का प्रतीक बन गया है|
    अब गांवों में भी सरकारी स्कूलें खाली पड़ी रहती है|
    और ,



    दीपक बाबा ने कहा…
    विचारणीय लेख....


    अभी हाल ही में दिल्ली के एम सी डी विद्यालय में गया ... विद्यालय भवन देख कर ही में भौचक रह गया ... इतना बढिया भवन है, पर ढंग से कैरिंग न होने के कारन ठीक नहीं रह पाता... यही गर अभिवावकों से बिल्डिंग फंड के नाम पर पैसा ले लिया जाय तो बच्चे भवन को गन्दा नहीं करेंगे.


    और ,




    shikha varshney ने कहा…
    सभी सरकारी स्कूलों की गत बुरी है ऐसा नहीं है. परन्तु ज्यादातर का बुरा हाल है. जहाँ न सुविधाएँ हैं न शिक्षकों में पढाने की ललक, क्लास में बैठ कर वे या तो स्वेटर बुनती नजर आती हैं या अपने व्यक्तिगत कार्य निबटाते टीचर.क्योंकि पढाना तो स्कूल के बाद ट्यूशन में होगा.
    ऐसे में मजबूरी है अविभावकों की कि निजी स्कूल की तरफ रुख करें.


    मेरे ख्याल से तो ऐसा सिर्फ़ स्कूलों ही क्यों अस्पतालों के साथ भी होना चाहिए कि हर सरकारी अस्पताल में सरकारी कर्मचारियों , अधिकारियों , नेताओं , मंत्रियों के बच्चे पढेंगे । मेरे ख्याल से सच में ही बहुत फ़र्क पड जाएगा । कम से कम इन्हें असलियत महसूस तो होगी ।

     पिछले दिनों , ब्लॉग पोस्टों की चर्चा करने वाले सबसे लोकप्रिय चिट्ठे ..चिट्ठाचर्चा पर कम बैक करते हुए अनूप शुक्ल जी ने खूब नए नए खुलासे किए जिनमें से एक था ..ब्लॉग संकलक के रूप में प्रसिद्ध हुआ ब्लॉग हिंदी ब्लॉगजगत के संचालकों का खुलासा , जिनको चलाने वाले के बारे में जब उन्होंने बताया तो उस पर ये प्रतिक्रियाएं मिलीं ,



    1. हिंदीब्लॉगजगत ही वह संकलक है जिसे मैं इस्तेमाल करता हूँ, बाकि संकलकों पर गये महीनों हो गये।

      वैसे मुझे पता नहीं था कि निशांत मिश्र जी ने इसे बनाया है, जबकि एकाध बार मैंने श्रीमान हिन्दीब्लॉगजगत को मेल से सम्पर्क भी किया था अपना फोटो ब्लॉग थॉट्स ऑफ लेन्स जोड़ने के सिलसिले में...तब भी पता न चला था कि सामने निशांत जी ही हैं :)

      Secrecy break हुई आज....at least for me :)

      इसका उत्तर फ़ौरन ही मिला :- 
      उत्तर
      1. Nishant
        सतीश जी,
        हिंदीब्लौगजगत बनाने के पीछे दो व्यक्तियों का हाथ है. दोनों ही इसे मैनेज कर सकते हैं. उनमें से एक मैं हूँ इसका भेद खुल गया है. दूसरे ब्लौगर नहीं चाहते कि उनका नाम सामने आये इसलिए अहतियात रखना पड़ेगा. मैं उसमें पोस्ट आदि लगाने के विरुद्ध था और अब उसे केवल संकलक मात्र के रूप में देखकर ही संतुष्टि होती है. फिलहाल यह बढ़िया ब्लौगों तक पहुँचने का बढ़िया विकल्प है.
      2. Nishant
        सतीश जी,
        हिन्दीब्लौगजगत बनाने के पीछे दो ब्लौगरों का हाथ है. उनमें से एक मैं हूँ यह भेद खुल चुका है. हम दोनों ही इसे मैनेज करते हैं. दूसरे ब्लौगर अपना परिचय सार्वजनिक नहीं करना चाहते इसलिए अब अहतियात रखना पड़ेगा. मैं इसमें पोस्ट आदि करने के विरुद्ध था. यह अपने वर्तमान स्वरूप में ही उपयोगी है.

    अभी हाल ही में दिल्ली में एनडीटीवी के कार्यक्रम हम लोग में मुनव्वर राना साहब ने शिरकत की तो हमारे कुछ ब्लॉगर्स साथी जिन्हें उस कार्यक्रम का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ , बोनस में मुनव्वर राना साहब से मुलाकात हो गई । उनमें से ही एक अपने माट साब रहे , और उनसे मिलने के बाद पोस्ट ठेल के सुपर इश्टारडम को और चार चांद लगा दिए , उनकी पोस्ट पर 
    टीपते हुए बोले ...........
    मैं इलाहाबाद में था तो त्रिवेणी महोत्सव के मुशायरे में मुनव्वर राणा को सुनने के लिए देर रात तक इन्तजार करता था क्योंकि उनकी बारी सबसे अन्त में आती थी। लेकिन उनके नगीने जड़े शेरों के लिए पहले के तमाम शौरा को बर्दाश्त कर लेते थे। राहत इन्दौरी भी अन्त में ही आते थे।


    आपने इस बेजोड़ सख़्शियत का नजदीक से दीदार किया और फोटुएँ खिंचवा ली तो बधाई भी रसीद कर देता हूँ।
    और रविकर फ़ैज़ाबादी अपने खास अंदाज़ में टीपते हुए कहते हैं ........
    राय बरेली का जमा, दिल्ली में जो रंग |
    जमी मुनौव्वर शायरी, एन डी टी वी दंग |
    एन डी टी वी दंग, अजी संतोष त्रिवेदी |
    आया किसके संग, इंट्री किसने दे दी |
    कहाँ मित्र अविनाश, स्वास्थ्य कैसा है भाई ?
    श्रेष्ठ कलम का दास, स्वस्थ हो, बजे बधाई ||


    पल्लवी सक्सेना अपने ब्लॉग पर अपने अनुभव बांटते हुए बहुत कुछ कमाल का लिखती हैं , शायद इसीलिए उनके ब्लॉग का नाम ही अनुभव है । आज उन्होंने , अपेक्षाओं  यानि Expectation को क्या खूब
    परिभाषित किया है  ,और इस पर टीपते हुए , देखिए पाठक क्या कहते हैं ,




    कहते है उम्मीद पर तो दुनिया कायम है हम दूसरो से उम्मीदे रखते है तभी तो शायद जीवित है | पत्निया पति के कहने से पहले ही उनकी सारी उम्मीदे पूरी कर देती है बची हुई हक़ से कह कर पति पुरा करा लेते है जबकि इस मामले में पत्निया शुरू में ही सोच लेती है की क्या फायदा कहने से पूरी होने वाली नहीं है :) लेकिन समस्या ये है की जब तक आप कहेंगी नहीं तब तक पता कैसे चलेगा की आप की उम्मीद क्या है तो बोलिये और अपनी उम्मीदे भी हक़ से उनसे पूरी करवाइए जो आप के अपने है |


    और ,

    पल्लवी बिटिया, इस समस्या को गीतों के माध्यम से सुलझाने की कोशिश करता हूँ.


    ‘वफ़ा जिनसे की बेवफ़ा हो गए.....’ यह अपेक्षाएँ पूरी न होने की एक स्थिति है.


    ‘दिल को है तुम से प्यार क्यों यह न बता सकूँगा मैं.....’ इसमें अपेक्षाओं को परिभाषित न कर पाने की स्थिति है.


    ‘तू है हरजाई तो अपना भी यही तौर सही, तू नहीं और नहीं, और नहीं, और सही.....’ यह अपेक्षाएँ पूरी न होने पर अपेक्षाओं का नया आधार ढूँढने की स्थिति है.


    ‘टूटे न दिल टूटे न, साथ हमारा छूटे न.....’ यह अपेक्षाओं की उफनती नदी है.


    ‘छोड़ कर तेरे प्यार का दामन, ये बता दे के हम किधर जाएँ.....’ यह अपेक्षाओं की बाढ़ है.


    अपेक्षाओं से बचना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है.....ऐसा अपेक्षा नाम का 'डॉन' स्वयं कह गया है :))


    एम वर्मा जी , बहुत बेहतरीन कविताएं , गज़ल लिखते हैं , उनके बिम्ब प्रतिबिंब का तो कहना ही क्या , आज वे पत्थर के गांव में आइना लेकर जब ठहरे तो उस पर  , पाठकों की राय कुछ इस तरह आई ,


    बेपनाह मुहब्बत का सबूत और क्या होगा

    पत्थरों के गाँव में ठहरने लगा है आईना

    काफी रिस्क उठा रहा है ये मजनू तो :) मगर क्या करे वो कहते हैं कि प्यार अँधा होता है उसे रिस्क-विस्क नजर नहीं आता :) बहुत सुन्दर प्रस्तुति !


    पूजा उपाध्याय ने आज जो कहानी अपने ब्लॉग पोस्ट के रूप में लिखी है उसके लिए वे खुद कहती हैं कि ये कहानी थोडी डिस्टर्बिंग और वायलेंट है , लेकिन पाठक कहते हैं



    खतरनाक कहानी.... आरम्भ से अंत तक बांधे रखा!
    कई बार शरीर में सिहरन सी अनुभव हुयी!पता नहीं ऐसी कहानी लिखी जनि चाहिए या नहीं.... पर.....
    पढता चला गया और दो-तीन बार पढ़ कर कमेन्ट करने की हालत में आया...

    कुँवर जी,
    उडनतश्तरी जी , बहुत दिन का अबसेंटी मार रहे हैं आजकल । टिप्पी तो टिप्पी पोस्टवो सब ...गाडी विलंब से आने की सूचना है , टाईप से सुस्ता सुस्ता के लिख रहे हैं । आज एक ठो राज़ पिछले जनम का जैसे ही खोले , कि देखिए दोस्त मित्रों ने क्या कहा



    Devendra Gautam ने कहा…

    तो यह है आपकी लेखनी में धार का रहस्य. आपके गद्य में चुटीलेपन का राज़. आप खुशकिस्मत हैं कि हरिशंकर परसाई जैसी विभूति का सानिध्य मिला. मुझे लगता है कि परसाई जी पर काफी कुछ किया जाना बाकी है. उनका लिखा हुआ बहुत पढ़ा है लेकिन उनके निजी, पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन जीवन के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है. सिर्फ इतना पता है कि वे जबलपुर में रहते थे और अंतिम दिनों में काफी अस्वस्थ रहे थे. 

    और ,

    राजेश उत्‍साही ने कहा…
    परसाई जी के हाथों पुरस्‍कार। बधाई। वे जिनके मामा होते हैं उनसे होशंगाबाद में हमारी मित्रता रही। पर मिलने का मौका तो कभी नहीं आया। हां मप्र साहित्‍य परिषद की पत्रिका साक्षात्‍कार के अंक में कुछ ऐसा संयोग हुआ कि उनका व्‍यंग्‍य और मेरी कविता आमने सामने के पृष्‍ठ पर प्रकाशित हुई थी। हमने तो उसे ही अपना पुरस्‍कार मान लिया था।
    *
    आपके संस्‍मरण ने बहुत कुछ बताया और याद दिलाया।


    तो चलिए आज के लिए इतना ही , इसलिए तो कहता हूं कि पोस्टें भी लिखिए और टिप्पणियां भी । अजी हम टिप्पणियां भी पढते हैं , और खूब पढते हैं । 

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