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शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

टिप्पणियों पर लगा टिप्पों का तडका …झा जी पढिन , फ़िर कहिन ….

 
September 23, 2010 10:07 AM

H P SHARMA said...

अच्छा सब्जेक्ट है. एक ललित निबंध लिखने की कोशिस कर रहा हूँ.
saas - bahoo - betee
_________________
हर लडकी किसी ना किसी की बेटी जरूर होती है, लेकिन जरूरी नहीं कि हर लडकी सास बने. अधिकतर बेटियाँ पदोन्नत होकर किसी और घर में बहू भी बन जाती हैं, लेकिन उसके लिए सास एक के साथ एक गिफ्ट में पति के साथ मिलती है.
कहीं कहीं ऐसा भी होता है कि किसी सास की बहू (बड़े घराने में शादी) बनने के लिए समझदार बेटियाँ सास का स्तर देखके उसके लल्लू पप्पू टाइप लड़के से शादी कर लेती हैं. जो ज्यादा समझदार होती हैं वो खूब जानती हैं कि लड़के ज्यादातर लल्लू पप्पू ही होते हैं उनको जेंटल मैन तो उन जैसी समझदार महिला ही बनाती हैं. बेटी होना बहुत आसान है बहू होना भी पर अच्छी बहू होना थोडा मुश्किल है, पर अच्छी सास होना समझो नामुमकिन नहीं तो आसान भी नही है. अधिकतर खराब बहू अच्छी बेटियाँ होती हैं ऐसे ही अधिकतर खराब सास अधिकतर अच्छी माँ. सास होने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नही करना पड़ता. बेटे का जिस दिन सर फिर जाये और उसे कोई सिरफिरी मिल जाये तो चाहे अनचाहे बेटे की माँ सास बन ही जाती है. जाते जाते अच्छी सासें ना केवल अच्छी सास होती हैं वरन अच्छी माँ भी सावित होती हैं. ऐसे ही अच्छी बहू भी अच्छी बहू ही नही अच्छी बेटी भी सावित होती

 

 टिप्पा :- क्या हरि भाई …ललित निबंध आप लिखेंगे तो ललित शर्मा जी फ़िर क्या लिखेंगे …..ये उनका किताबराईट है …सास बहू रिलेशनशिप का इत्ता बढिया ..विश्लेषण किया आपने कि …खुद मैगी वाले भी कह रहे हैं कि ….कि ये बात तो हमारे मैगी सास को भी अच्छी लगी है । मगर सुना है कि एकता कपूर आपको डंडा लेकर ढूंढ रही है ……अब उसके सीरीयलों की थ्योरी ही उलट देंगे आप तो फ़िर तो यही होगा न …..बहरहाल ..ललित निबंध हो या हरि निबंध ( आखिरकार शर्मा तो कौमन है ही ) ..उसका टॉपिक ..सास बहू संबंध नहीं …..सास दामाद संबंध होना चाहिए ..कुछ इस पर भी प्रकाश डाला जाए …इस विषय पर कटेंट की बडी ही कमी है …..कसम से

September 23, 2010 12:38 PM

DEEPAK BABA said...

बढिया है - साहिब........ मैं बस एक ये ही प्रोग्राम देखता हूँ. एनडीटीवी पर रवीश और विनोद दुआ को भी देखता था - पर आजकल हमारे केबल वाला ये चनेल दिखा नहीं रहा..........
अच्छी प्रस्तुति होती है - बड़ी खबर कि - और साथ में एस पी सिंह के स्टाईल में पंडित जी.
बढिया.

 

टिप्पा : बस एके ठो प्रोग्राम …आप तो खुदे बाबा है प्रभु..कौनो बाबा का लाईव डैड टेलिकास्ट भी नहीं ,…….ई तो जुलुम है महाराज ….आपके केबल वाला चनेल नहीं दिखा रहा ..अरे मारिए उसको गोली …टाटा जी कहिए …ऊ आजकल सबका लाईफ़ झिंगालाला कर रहे हैं …..जाने कौन स्काई लगाए दे रहे हैं सबके छत पर …..एक तो आलरेडी जो स्काई है …ऊ ससुरा अबकि पानी बरसा बरसा के सब पानी पाने किए दे रहा है ..अब ई नयका स्काई जाने का का करेगा ..

9/23/2010 7:56 PM

अमित शर्मा ने कहा…

बाकी गूगल की कारस्तानी से मैं भी कई बार हैरान हुआ हूँ, अभी तो ठीक है. एक बार "नाद" खोजने के लिए हिंदी सर्च के लिए "na" लिखते ही नहाते-नहाते और भी ना जाने क्या क्या अश्लील साइटों के लिंक हाज़िर हो गए थे >>>>>>>>>>>> भला हो भास्कर का......................... पर यह सब यही दिखाता था की हिंदी

  

टिप्प:- का अमित बाबू ..न ….लिखे तो एतना दर्शन हो गया …यदि गलती से हां लिख देते आप तो जाने का जुलुम हो जाता ….हमें तो लगता है कि नहाते नहाते ..धोना सुखाना भी सब्बै हो ही जाता ……और गूगल बाबा तो ..हमेशा ही ससुरे लुच्चों का फ़ेवर करते रहे हैं …इनका मेमोरी में …यही सब फ़िटिंग ..धपाक से हो जाता है …आ पूछिएगा कि …बालकांड पर कुछ बताईये …तो कहेगा ……..ओह ! क्या बालकों ने भी कांड करना शुरू कर दिया …गूगल तो हईये है अईसन

२३ सितम्बर २०१० ११:१३ अपराह्न

shikha varshney ने कहा…

यही मानसिकता है जो औरतों को आगे बढ़ने नहीं देती थक गए नारी वादी नारे लगा लगा के.
पर बचपन का बाइस्कोप खूब दिखाए आप मजा आ गया .

 

टिप्पा : देखा थक गए न …हम नहीं कहते थे कि नारे मत लगाईये ….मुदा आप लोग मानते ही नहीं है , अरे इसके लिए अपना राष्ट्रीय महिला आयोग है न …ऊ भी तो खाली नारा लगाने का ही काम करता है । आयं बचपन में आप भी ओहि मेला में घूमते थे ..बायस्कोप बाला सलीमा दिखाता था जिसमें ……एक ठो कैमरा वाला भी रहता था ..पता नहीं कैमरा के ऊपर एक ठो काला चदरिया रखा रहता था ..जिसमें मुंडी समेत ..घुस कर फ़ोटो खींचता था ..ओहि बाला न

गिरीश बिल्लोरे ने कहा… on 
२३ सितम्बर २०१० ११:४१ अपराह्न

मेरे मन्दिर तेरी मस्ज़िद का हो इक दरवाज़ा,
पास से चर्च की घण्टी सुनाई दे मुझको
घर बिरहमन के कुराने पाक़ पढ़ी जाए
मौलवी दे दीवाली की बधाई सबको

 

टिप्पा ":- गिरिश भी ..हमारे हिसाब से आपका ई लाईन को …एक ठो तख्ती पर लिख कर वहां टांग देना चाहिए …जहां लिखा है कि ..ये विवादित भूमि है , अभी फ़ैसला आना बांकी है , हे आम आदमी /लोगों ,बहुत सारे नाटक तो आप पहले ही कर चुके हैं …बांकी के नाटक …आप फ़ैसला आने के बाद ही करें ।

September 24, 2010 4:41 AM

सुनीता शानू said...

अरे माधव हमने तो कभी नाम भी नही सुना इस लिट्टी चोखे का इतने लोग बोल रहे हैं तो अच्छा ही होगा। मगर बनाये कैसे? पूरी विधि लिख दो तो भला हो वरना मुह में पानी व्यर्थ आता रहेगा :)

टिप्पा :- का कह रही हैं आप ….लालू जी सुनेंगे तो बेचारे ई डबल सदमा हो जाएगा उनके लिए …। राबडी कंप्लेंट करेंगी सो अलग । लिट्टी चोखा तो हमरे  बिहार का राष्ट्रीय फ़ास्ट फ़ूड है ..खाना  तो खाना …..उसको  बनाने का रेसिपी और मेथड ..बिल्कुल ऐसा है कि मानो आप “ खतरों के खिलाडी “ में भाग ले रहे हों ….तनिक विस्तार से बताएंगे आपको किसी दिन एक ठो पोस्ट में …..रे सुन रहे हो न बिहारी भाई लोग …….सुनीता ..जी की मदद करो भाई ॥

 

२३ सितम्बर २०१० ७:०६ पूर्वाह्न

shyam1950 ने कहा…

नहीं उषा ! इससे तो कहीं बेहतर है "स्वीकार लो मुझे" कम से कम उसमें कविता के खिलने की सम्भावना तो है! .. उस मामले में आप थोड़ी जल्द-बाज़ी कर गयी हैं..बस ! ..एक तो उसमें लता-भाव वाला शीर्षक मुझे ठीक नहीं लगा था ..दूसरे कुछ शब्दों को इधर उधर करने से उसमें एक निखार आ सकता था .. लेकिन यह तो ..!
मैं जब आपको पढता हूँ तो एक एक शब्द में उतर कर पढता हूँ जहां उन शब्दों की अर्थ-छटाएं बिखरती हैं वहाँ कहीं आपकी झलक मिलती है मुझे तो उस झलक का पीछा करने में ही कविता का स्वाद मिलता है

 

टिप्पा :- ओह इत्ती गहन व्याख्या …….बहुत ही बढिया …इससे लगता है कि हां कविता की व्याख्या तो अईसन ही हो ..एक हम लोग हैं जो बडे चाव से बडा भाव है लिख कर चल देते हैं ….अब करें क्या समझ ही नहीं है इससे ज्यादा तो ..

 

२३ सितम्बर २०१० १०:४२ अपराह्न
कुमार राधारमण ने कहा…

ऐसी पत्नी किसी भूत से कम नहीं है पति के लिए। जिसे लग जाए,एक ही बार में तीनो वाल्व फेल।

 

टिप्पा :- का बात कर रहे हैं राधारमण जी …..ओह अच्छा अच्छा …आप कुमार हैं न इसलिए ..अरे महाराज कुमार से श्री बनते बनते सब ठो ज्ञान का बात ….पूछिए मत कहां निकल जाता है …रह जाते हैं ..तो बस मैं और मेरी भूत ….की तन्हाईयां ॥

September 23, 2010 7:39 AM

महफूज़ अली said...

यहाँ सबने तो ध्यान से पढ़ी.... और मैं ध्यान से पढने के बावजूद भी अच्छा कमेन्ट नहीं कर पाया.... पर इस बार का संस्मरण रुपी पोस्ट बहुत अच्छी लगी... तीनों इन्सीडेंटस अपने आप में यूनिक हैं... दरअसल होता क्या है ना कि ... देखिये... बहू-बेटी की नींव तो शादी के वक़्त ही डल जाती है... अब साइकोलॉजिकल फैक्टर देखिये... कि ... जिस बेटे को माँ ने तीस साल तक पाला... उसकी शादी होती है... तो क्या होता है ना... कि शादी के बाद जो डिमांड वो अपनी माँ से करता था... वोही डिमांड अब वो अपनी बीवी से करता है.... पानी लाओ... कपडे लाओ... रुमाल लाओ... खाना लाओ... चड्डी लाओ....बनियान लाओ..... और भी कई सारे काम वो अपनी बीवी से ही करवाता है... ज़ाहिर सी बात है.. कि जो माँ उसे तीस सालों से उसकी फरमाइशों को पूरा कर रही थी... तो उसे क्या लगेगा... उसे तो यही लगेगा ना कि बहू ... ने आते ही बेटे पर कब्ज़ा जमा लिया... और यहीं से कॉन्फ्लिक्ट शुरू होता है... जबकि यहाँ सारी गलती बेटे की है... वो माँ का साइकोलॉजिकल स्टेटस नहीं समझ पाता है... और सबसे बड़ी बात उसकी सेक्सुयल भड़ास तो बीवी से ही निकलेगी.... तो वो सारा इम्पौरटैंस बीवी को ही देने लगता है... और यहाँ माँ गलत समझ लेती है.. वो सारी भड़ास बहू पर ही निकालती है... कि उसके आते ही सब बदल गया... यहाँ बेटे का काम होता है कि वो माँ-और बीवी में ताल-मेल बैठाये. . ... ऐसे ही सिचुएशंस पर माँ जो होती है वो बहू को अपनी प्रतिद्वंदी समझती है... और उसे मेंटल दर्द देना शुरू करती है...सारा खेल अटेंशन पाने का है... माँ को अब बेटे का अटेंशन चाहिए... त वो सारे काम करेगी जिससे कि बेटे का अटेंशन उस पर आ जाये.....अब यहाँ बहू का रोल बेटी की तरह होना चाहिए... जो कि ना के ही बराबर होता है... क्यूँ? क्यूंकि वो अपने मायके से यह सीख कर ही आती है कि बेसिकली सास सब खराब होतीं हैं... तो अब ज़रा सा सास ने कुछ बोल दिया ... तो राईवलरी में आ खडी होतीं हैं... तो यहाँ लड़की की माँ का रोल यह होता है कि वो लड़की के मन में सास टाइप का ख्याल निकले... और यही सीख दे ,..... कि सास भी माँ ही होती है... अगर बेटा मानसिक तौर पर डेवलप है तो वो कभी भी ऐसी कोई सिचुएशन लाएगा ही नहीं... जिससे कि कॉन्फ्लिक्ट हो... और बहू ... का रोल भी यही होता है कि वो सास में अपनी माँ को देखे... और उनके मेंटल स्टेटस को समझे... और जब ऐसा हो जायेगा... तो सब ठीक हो जायेगा... और इसमें सारा रोल ना सास का होता है ...ना बहू का.... वो पूरा रोल बेटे का होता है...

 

 

टिप्पा :- अमां महफ़ूज़ मियां …ये  टिप्पणी थी या पोस्ट । तब कहते हो कि टाईम नहीं मिलता पोस्ट लिखने का ..अब इत्ता जब टीपोगे तो कहां से मिलेगा । और हां ई का ..आप इत्ता ढेर लिखे हो उनका सायक्लोजी पर ..तो बियाह काहे नहीं करते ..हम आपका प्रोफ़ेसरी ..बियाह के बाद वाला देखना चाहते हैं

 
 
दीपक 'मशाल' said...

आँखें खोलती एक बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक पोस्ट... इस मामले में कम से कम हम लोग तो सुखी हैं जो यहाँ सिर्फ गाय का और शुद्ध दूध नसीब हो जाता है..

9/24/10 5:34 AM

 

टिप्पा :- अरे दीपक , सुनो तीन लीटर का जुगाड हो सकता है, क्या ,…..अरे नहीं नहीं चैट पर मत भेजना दिक्कत हो जाएगा ..हम अपना लंबर दे रहे हैं …इंस्टैंट मैसेज कर देना ठीक है न

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