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शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

टिप्पणियों पर लगा टिप्पों का तडका …झा जी पढिन , फ़िर कहिन ….

 
September 23, 2010 10:07 AM

H P SHARMA said...

अच्छा सब्जेक्ट है. एक ललित निबंध लिखने की कोशिस कर रहा हूँ.
saas - bahoo - betee
_________________
हर लडकी किसी ना किसी की बेटी जरूर होती है, लेकिन जरूरी नहीं कि हर लडकी सास बने. अधिकतर बेटियाँ पदोन्नत होकर किसी और घर में बहू भी बन जाती हैं, लेकिन उसके लिए सास एक के साथ एक गिफ्ट में पति के साथ मिलती है.
कहीं कहीं ऐसा भी होता है कि किसी सास की बहू (बड़े घराने में शादी) बनने के लिए समझदार बेटियाँ सास का स्तर देखके उसके लल्लू पप्पू टाइप लड़के से शादी कर लेती हैं. जो ज्यादा समझदार होती हैं वो खूब जानती हैं कि लड़के ज्यादातर लल्लू पप्पू ही होते हैं उनको जेंटल मैन तो उन जैसी समझदार महिला ही बनाती हैं. बेटी होना बहुत आसान है बहू होना भी पर अच्छी बहू होना थोडा मुश्किल है, पर अच्छी सास होना समझो नामुमकिन नहीं तो आसान भी नही है. अधिकतर खराब बहू अच्छी बेटियाँ होती हैं ऐसे ही अधिकतर खराब सास अधिकतर अच्छी माँ. सास होने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नही करना पड़ता. बेटे का जिस दिन सर फिर जाये और उसे कोई सिरफिरी मिल जाये तो चाहे अनचाहे बेटे की माँ सास बन ही जाती है. जाते जाते अच्छी सासें ना केवल अच्छी सास होती हैं वरन अच्छी माँ भी सावित होती हैं. ऐसे ही अच्छी बहू भी अच्छी बहू ही नही अच्छी बेटी भी सावित होती

 

 टिप्पा :- क्या हरि भाई …ललित निबंध आप लिखेंगे तो ललित शर्मा जी फ़िर क्या लिखेंगे …..ये उनका किताबराईट है …सास बहू रिलेशनशिप का इत्ता बढिया ..विश्लेषण किया आपने कि …खुद मैगी वाले भी कह रहे हैं कि ….कि ये बात तो हमारे मैगी सास को भी अच्छी लगी है । मगर सुना है कि एकता कपूर आपको डंडा लेकर ढूंढ रही है ……अब उसके सीरीयलों की थ्योरी ही उलट देंगे आप तो फ़िर तो यही होगा न …..बहरहाल ..ललित निबंध हो या हरि निबंध ( आखिरकार शर्मा तो कौमन है ही ) ..उसका टॉपिक ..सास बहू संबंध नहीं …..सास दामाद संबंध होना चाहिए ..कुछ इस पर भी प्रकाश डाला जाए …इस विषय पर कटेंट की बडी ही कमी है …..कसम से

September 23, 2010 12:38 PM

DEEPAK BABA said...

बढिया है - साहिब........ मैं बस एक ये ही प्रोग्राम देखता हूँ. एनडीटीवी पर रवीश और विनोद दुआ को भी देखता था - पर आजकल हमारे केबल वाला ये चनेल दिखा नहीं रहा..........
अच्छी प्रस्तुति होती है - बड़ी खबर कि - और साथ में एस पी सिंह के स्टाईल में पंडित जी.
बढिया.

 

टिप्पा : बस एके ठो प्रोग्राम …आप तो खुदे बाबा है प्रभु..कौनो बाबा का लाईव डैड टेलिकास्ट भी नहीं ,…….ई तो जुलुम है महाराज ….आपके केबल वाला चनेल नहीं दिखा रहा ..अरे मारिए उसको गोली …टाटा जी कहिए …ऊ आजकल सबका लाईफ़ झिंगालाला कर रहे हैं …..जाने कौन स्काई लगाए दे रहे हैं सबके छत पर …..एक तो आलरेडी जो स्काई है …ऊ ससुरा अबकि पानी बरसा बरसा के सब पानी पाने किए दे रहा है ..अब ई नयका स्काई जाने का का करेगा ..

9/23/2010 7:56 PM

अमित शर्मा ने कहा…

बाकी गूगल की कारस्तानी से मैं भी कई बार हैरान हुआ हूँ, अभी तो ठीक है. एक बार "नाद" खोजने के लिए हिंदी सर्च के लिए "na" लिखते ही नहाते-नहाते और भी ना जाने क्या क्या अश्लील साइटों के लिंक हाज़िर हो गए थे >>>>>>>>>>>> भला हो भास्कर का......................... पर यह सब यही दिखाता था की हिंदी

  

टिप्प:- का अमित बाबू ..न ….लिखे तो एतना दर्शन हो गया …यदि गलती से हां लिख देते आप तो जाने का जुलुम हो जाता ….हमें तो लगता है कि नहाते नहाते ..धोना सुखाना भी सब्बै हो ही जाता ……और गूगल बाबा तो ..हमेशा ही ससुरे लुच्चों का फ़ेवर करते रहे हैं …इनका मेमोरी में …यही सब फ़िटिंग ..धपाक से हो जाता है …आ पूछिएगा कि …बालकांड पर कुछ बताईये …तो कहेगा ……..ओह ! क्या बालकों ने भी कांड करना शुरू कर दिया …गूगल तो हईये है अईसन

२३ सितम्बर २०१० ११:१३ अपराह्न

shikha varshney ने कहा…

यही मानसिकता है जो औरतों को आगे बढ़ने नहीं देती थक गए नारी वादी नारे लगा लगा के.
पर बचपन का बाइस्कोप खूब दिखाए आप मजा आ गया .

 

टिप्पा : देखा थक गए न …हम नहीं कहते थे कि नारे मत लगाईये ….मुदा आप लोग मानते ही नहीं है , अरे इसके लिए अपना राष्ट्रीय महिला आयोग है न …ऊ भी तो खाली नारा लगाने का ही काम करता है । आयं बचपन में आप भी ओहि मेला में घूमते थे ..बायस्कोप बाला सलीमा दिखाता था जिसमें ……एक ठो कैमरा वाला भी रहता था ..पता नहीं कैमरा के ऊपर एक ठो काला चदरिया रखा रहता था ..जिसमें मुंडी समेत ..घुस कर फ़ोटो खींचता था ..ओहि बाला न

गिरीश बिल्लोरे ने कहा… on 
२३ सितम्बर २०१० ११:४१ अपराह्न

मेरे मन्दिर तेरी मस्ज़िद का हो इक दरवाज़ा,
पास से चर्च की घण्टी सुनाई दे मुझको
घर बिरहमन के कुराने पाक़ पढ़ी जाए
मौलवी दे दीवाली की बधाई सबको

 

टिप्पा ":- गिरिश भी ..हमारे हिसाब से आपका ई लाईन को …एक ठो तख्ती पर लिख कर वहां टांग देना चाहिए …जहां लिखा है कि ..ये विवादित भूमि है , अभी फ़ैसला आना बांकी है , हे आम आदमी /लोगों ,बहुत सारे नाटक तो आप पहले ही कर चुके हैं …बांकी के नाटक …आप फ़ैसला आने के बाद ही करें ।

September 24, 2010 4:41 AM

सुनीता शानू said...

अरे माधव हमने तो कभी नाम भी नही सुना इस लिट्टी चोखे का इतने लोग बोल रहे हैं तो अच्छा ही होगा। मगर बनाये कैसे? पूरी विधि लिख दो तो भला हो वरना मुह में पानी व्यर्थ आता रहेगा :)

टिप्पा :- का कह रही हैं आप ….लालू जी सुनेंगे तो बेचारे ई डबल सदमा हो जाएगा उनके लिए …। राबडी कंप्लेंट करेंगी सो अलग । लिट्टी चोखा तो हमरे  बिहार का राष्ट्रीय फ़ास्ट फ़ूड है ..खाना  तो खाना …..उसको  बनाने का रेसिपी और मेथड ..बिल्कुल ऐसा है कि मानो आप “ खतरों के खिलाडी “ में भाग ले रहे हों ….तनिक विस्तार से बताएंगे आपको किसी दिन एक ठो पोस्ट में …..रे सुन रहे हो न बिहारी भाई लोग …….सुनीता ..जी की मदद करो भाई ॥

 

२३ सितम्बर २०१० ७:०६ पूर्वाह्न

shyam1950 ने कहा…

नहीं उषा ! इससे तो कहीं बेहतर है "स्वीकार लो मुझे" कम से कम उसमें कविता के खिलने की सम्भावना तो है! .. उस मामले में आप थोड़ी जल्द-बाज़ी कर गयी हैं..बस ! ..एक तो उसमें लता-भाव वाला शीर्षक मुझे ठीक नहीं लगा था ..दूसरे कुछ शब्दों को इधर उधर करने से उसमें एक निखार आ सकता था .. लेकिन यह तो ..!
मैं जब आपको पढता हूँ तो एक एक शब्द में उतर कर पढता हूँ जहां उन शब्दों की अर्थ-छटाएं बिखरती हैं वहाँ कहीं आपकी झलक मिलती है मुझे तो उस झलक का पीछा करने में ही कविता का स्वाद मिलता है

 

टिप्पा :- ओह इत्ती गहन व्याख्या …….बहुत ही बढिया …इससे लगता है कि हां कविता की व्याख्या तो अईसन ही हो ..एक हम लोग हैं जो बडे चाव से बडा भाव है लिख कर चल देते हैं ….अब करें क्या समझ ही नहीं है इससे ज्यादा तो ..

 

२३ सितम्बर २०१० १०:४२ अपराह्न
कुमार राधारमण ने कहा…

ऐसी पत्नी किसी भूत से कम नहीं है पति के लिए। जिसे लग जाए,एक ही बार में तीनो वाल्व फेल।

 

टिप्पा :- का बात कर रहे हैं राधारमण जी …..ओह अच्छा अच्छा …आप कुमार हैं न इसलिए ..अरे महाराज कुमार से श्री बनते बनते सब ठो ज्ञान का बात ….पूछिए मत कहां निकल जाता है …रह जाते हैं ..तो बस मैं और मेरी भूत ….की तन्हाईयां ॥

September 23, 2010 7:39 AM

महफूज़ अली said...

यहाँ सबने तो ध्यान से पढ़ी.... और मैं ध्यान से पढने के बावजूद भी अच्छा कमेन्ट नहीं कर पाया.... पर इस बार का संस्मरण रुपी पोस्ट बहुत अच्छी लगी... तीनों इन्सीडेंटस अपने आप में यूनिक हैं... दरअसल होता क्या है ना कि ... देखिये... बहू-बेटी की नींव तो शादी के वक़्त ही डल जाती है... अब साइकोलॉजिकल फैक्टर देखिये... कि ... जिस बेटे को माँ ने तीस साल तक पाला... उसकी शादी होती है... तो क्या होता है ना... कि शादी के बाद जो डिमांड वो अपनी माँ से करता था... वोही डिमांड अब वो अपनी बीवी से करता है.... पानी लाओ... कपडे लाओ... रुमाल लाओ... खाना लाओ... चड्डी लाओ....बनियान लाओ..... और भी कई सारे काम वो अपनी बीवी से ही करवाता है... ज़ाहिर सी बात है.. कि जो माँ उसे तीस सालों से उसकी फरमाइशों को पूरा कर रही थी... तो उसे क्या लगेगा... उसे तो यही लगेगा ना कि बहू ... ने आते ही बेटे पर कब्ज़ा जमा लिया... और यहीं से कॉन्फ्लिक्ट शुरू होता है... जबकि यहाँ सारी गलती बेटे की है... वो माँ का साइकोलॉजिकल स्टेटस नहीं समझ पाता है... और सबसे बड़ी बात उसकी सेक्सुयल भड़ास तो बीवी से ही निकलेगी.... तो वो सारा इम्पौरटैंस बीवी को ही देने लगता है... और यहाँ माँ गलत समझ लेती है.. वो सारी भड़ास बहू पर ही निकालती है... कि उसके आते ही सब बदल गया... यहाँ बेटे का काम होता है कि वो माँ-और बीवी में ताल-मेल बैठाये. . ... ऐसे ही सिचुएशंस पर माँ जो होती है वो बहू को अपनी प्रतिद्वंदी समझती है... और उसे मेंटल दर्द देना शुरू करती है...सारा खेल अटेंशन पाने का है... माँ को अब बेटे का अटेंशन चाहिए... त वो सारे काम करेगी जिससे कि बेटे का अटेंशन उस पर आ जाये.....अब यहाँ बहू का रोल बेटी की तरह होना चाहिए... जो कि ना के ही बराबर होता है... क्यूँ? क्यूंकि वो अपने मायके से यह सीख कर ही आती है कि बेसिकली सास सब खराब होतीं हैं... तो अब ज़रा सा सास ने कुछ बोल दिया ... तो राईवलरी में आ खडी होतीं हैं... तो यहाँ लड़की की माँ का रोल यह होता है कि वो लड़की के मन में सास टाइप का ख्याल निकले... और यही सीख दे ,..... कि सास भी माँ ही होती है... अगर बेटा मानसिक तौर पर डेवलप है तो वो कभी भी ऐसी कोई सिचुएशन लाएगा ही नहीं... जिससे कि कॉन्फ्लिक्ट हो... और बहू ... का रोल भी यही होता है कि वो सास में अपनी माँ को देखे... और उनके मेंटल स्टेटस को समझे... और जब ऐसा हो जायेगा... तो सब ठीक हो जायेगा... और इसमें सारा रोल ना सास का होता है ...ना बहू का.... वो पूरा रोल बेटे का होता है...

 

 

टिप्पा :- अमां महफ़ूज़ मियां …ये  टिप्पणी थी या पोस्ट । तब कहते हो कि टाईम नहीं मिलता पोस्ट लिखने का ..अब इत्ता जब टीपोगे तो कहां से मिलेगा । और हां ई का ..आप इत्ता ढेर लिखे हो उनका सायक्लोजी पर ..तो बियाह काहे नहीं करते ..हम आपका प्रोफ़ेसरी ..बियाह के बाद वाला देखना चाहते हैं

 
 
दीपक 'मशाल' said...

आँखें खोलती एक बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक पोस्ट... इस मामले में कम से कम हम लोग तो सुखी हैं जो यहाँ सिर्फ गाय का और शुद्ध दूध नसीब हो जाता है..

9/24/10 5:34 AM

 

टिप्पा :- अरे दीपक , सुनो तीन लीटर का जुगाड हो सकता है, क्या ,…..अरे नहीं नहीं चैट पर मत भेजना दिक्कत हो जाएगा ..हम अपना लंबर दे रहे हैं …इंस्टैंट मैसेज कर देना ठीक है न

रविवार, 21 मार्च 2010

टिप्पणी टुक टुक : जस्ट हैव एक लुक (टिप्पणी चर्चा )

ओह बहुते अफ़सोस की बात है जी आजकल सब लोग टिप्पी करना कम कर दिए हैं जी ...और दूसरों का क्या कहें जब हम ही खुद बहुते एबसेंटी चल रहे हैं । जो रहे सहे बचे हुए हैं ..ऊ सब दे धनाधन ...इश्वर लडा रहे हैं ....सारा ताकत तो उसी में खर्च हुआ जा रहा है ....तो का होगा ।खैर हम भी बहुत घुसेडू बिलागर हैं .....लीजीए झेला जाए ............

घघुती बासुती जी के ब्लोग पर
श्री ज्ञानदत्त पांडे जी ने कहा…
यदि स्त्री शक्तिशाली बनें,ऊँचे पदों पर बैठें तो देखिए लहजा, भाषा सब बदल जाएँगे, कम से कम स्त्री के सामने तो।---------अपने बचपन से सुन रहा हूं। चौव्वन साल का हो गया। बदलाव है, पर उतना नहीं। :(
टिप्पा: का पांडे जी बचपने से कित्ता देख सुन रहे हैं ..ऊ भी कईसन कईसन सच्ची मुच्ची काबात चीत । खुद हमरी बुद्धिदानी में भी ई बात नहीं घुस रहा है कि ....राष्ट्पति , कांग्रेस अध्यक्षा , मुख्यमंत्री , करोडमाला पहनने वाली मालावती, और जाने कौन कौन शक्शिक्तिशाली पद पर तो बैठिये गई हैं महिलाएं ....फ़िर भी किरन बेदी को ......अपनी कचहरी अलग से लगानी पडती है. ......।आप चौव्वन के हो गए हैं .....तब जाके इता काम हुआ है बकिया work in in progress .....
देशनामा पर पोस्टों की डबल सेंचुरी पर

Udan Tashtari said...

वाह!! डबल सेन्चुरी--फटाफट. आनन्द आ गया. बहुत बहुत बधाई एवं अनेक शुभकामनाएँ.यहाँ जो सम्मान तुमने दिया है, सीना चौड़ा हो गया.बस, लिखते चलो. जल्द ही हजार पार करना है न!!
March 21, 2010 4:40 AM

बी एस पाबला said...

बधाई जी बधाई!इस बार लगता है वाकई बहुत बड़ी मुसीबत में फंस गए हैं। हमारा ध्यान तो बार बार उस लाईन की ओर जा रहा है, जहाँ आप लिख आए हैं कि पोस्ट की डबल सेंचुरी है तो कुछ बढ़िया कॉकटेल तो बनता है न बॉस...
टिप्पा :- लो कल्लो बात ...उडन जी आप पहिले से ही कोई कम चौडा हैं जो ...अब जाके सीना चौडा हुआ है ....कुछ लंबाई चौडाई भी तनिक बता देते तो हम अपना फ़्लैट बना लें ओईसे हमें ई तो पता है कि हमरे लिए एक ठो कोठरिया उहां पहले ही बना हुआ है । पाबला जी , एकदम अर्जुन वाला तीर मारा है आपने डायरेक्ट मछली की आख में ........बधाई शधई सब बाद की बात है ..

अदा जी पोस्ट पर आलसपन छोडते हुए

गिरिजेश राव said...

@ उनसे पूछो कि क्या आपको पता है आपकी पत्नी क्या चाहती है, या बेटा अथवा माँ-बाप क्या चाहते हैं, तो जवाब देना उनके लिए बहुत ही कठिन होगा...लेकिन कितनी आसानी से यही लोग यह बता देंगे कि ईश्वर या अल्लाह क्या चाहता है ..शमाँ तले अन्धेरा :) अन्धे के घर बिजली :)@मूर्खता की पराकाष्ठ शायद इसे ही कहते हैं....प्रेम करनेवाला ईश्वर है, लेकिन उसको उसकी सीमा बताने, और बाँधने वाला मनुष्य ...क्या बात है...!!!तमाम किताबात को पढ़ने के बाद माबदौलत इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि प्रेम करने वाली किसी आसमानी हुक़ूमत के वजूद को मानना सबसे अहमकाना बात है। इससे तौबा की जानी चाहिए। उसके मुकाबले इश्को मुहब्बत के लिए दुनियावी शख्स या कि जानवर भी मुफीद हैं। @ सभी अपने-अपने प्रभु से अपना व्यक्तिगत रिश्ता रखें, कोई भी इस मामले में हस्तक्षेप न करे, ठीक वैसे ही जैसे कि किसकी रसोई में क्या पक रहा है न किसी को इससे कोई सरोकार होना चाहिए न ही मतलब...ऊ जो कितबवा में लिक्खा है कि बन्दों को बढ़ाओ चाहे जैसे, उसका क्या होगा? ठेका मिला हुआ है और आप कहती हैं कि टेकेदारी बन्द करो। पेट पर लात ! नहीं चलेगा। हाय हाय, ऐसी गुस्ताखी नहीं चलेगी, नहीं चलेगी नहीं चलेगी।
हमारा टिप्पा :- अब ई ठहरे लंठ इनका टीप पर टिप्पा बैठाने से तो बढिया है कि चार ठो अलग से पोस्ट लिख दिया जाए । और ई का जी आप तो भोरे से कह थे कि आज आलस है मन नहीं न कर रहा है कुछो लिखने का इसलिए कुछो लिख दे रहे हैं । एतना बडका बडका टीप मारियेगा तो पोस्ट के लिए अईसन टाईप का ही फ़ीलींग होगा न ॥
गोदियाल जी के अंधड पर

डॉ टी एस दराल said...

आजकल तो कुत्तों के ही ज्यादा ठाठ बाठ हैं।गोदियाल जी , ये कौन सा बनवास काटकर लौटे हैं।खैर टिपण्णी खोलने का बहुत शुक्रिया।
टिप्पा:- हें हें हें ........का कह रहे हैं डा. साहब । कुकुर लोग का ठाट बाट ...नहीं नहीं आप इंसान के भीतर छुपे जानवर की बात कर रहे हैं न ......और फ़िर इस जानवर के भीतर ...यानि हर कुत्ते के अंदर एक इंसान होता है ....और वैसे ही कुछ इंसानों के अंदर भी कुत्ते होते हैं .....उफ़्फ़ ई कौन थ्योरी है यात हम तो खुद ही उलझ गए .। आज समझ में आया डाकटरी पढना उतना आसान नहीं है जित्ता हम समझ रहे थे । गोदियाल जी एकदम जमा जमा के टिप्पी बक्सा खोल रहे हैं । हम सोच रहे हैं कि यदि ऐसा ही सबने करना शुरू किया तो फ़िर हम टिप्पा काहे पर लगाएंगे जी ???
सवाल आपका है की इस पोस्ट पर
काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…
नक्शे का रूट से कोई लेना देना नहीं है...नाहक चैनलिए इसे मुद्दा बनाए बैठे हैं और रेवले के बाबू हैं कि टी0 वी0 चैनल का नाम सुनते ही सफाइयां देते घूमने लगते हैं. काहे नहीं इन जोकरों से पूछते कि क्या बाक़ी शहर भी नक्शे में वहीं हैं (?) जहां वो दिखाई दे रहे हैं...फिर एक ही शहर की बात क्यों ?
टिप्पा :- काजल भाई एकदम ठीक कह रहे हैं ..नक्शे का रूट से कोई लेना देना नहीं है। इसी सूत्र वाक्य को मन में बैठा लें तो आज तक हुए रेल हादसे , बस दुर्घटना के लिए सारा जस्टीफ़िकेशन मिल जाएगा । जोकरों से जो पूछने को जो कह रहे हैं वो जरूर पूछा जाए ...काहे से कि जब से सर्कस पर बैन लगा है बेचारे जोकर सब भी नहीं मिल पा रहे हैं ।
डा दराल के अंतर्मंथन पर

JC said...

डा. दराल साहिब ~ बात तो आपने सौ फीसदी सही कही...सरदार खुशवंत सिंह ने भी कभी एक लेख में लिखा था कि हम अब अपने ऊपर हँसना भूल गए हैं,,,और अब तो कार्टून, जो पहले 'मनोरंजन' का एक साधन माना जाया करता था, उसके ऊपर भी विवाद छिड़ जाते हैं...आदि आदि...'हम हिन्दुस्तानी' कभी अपनी सहनशीलता के लिए प्रसिद्द थे,,,किन्तु आज तो किसी से मजाक में भी बोलने में डर लगता है, क्यूंकि मालूम नहीं कब कोई पेट्रोल के समान भड़क उठे - 'रोड रेज' कि खबरें समाचार पत्रों में पढने को मिलती रहती हैं :) हम तो भाई अपनी मूर्खता पर ही अकेले-अकेले हंस लेते हैं - और 'उसको' कभी-कभी कह लेते हैं. "बता, चालाक से चालाक को मूर्ख बनाने में, तेरी मर्जी क्या है" ? क्यूंकि सर्वगुण संपन्न शायद वो ही हमेशा अकेला ही खुल के हंस पाता होगा हमारी सब की मूर्खता पर :)
टिप्पा :- जे सी ...नाम इतना शौर्ट हैंड में लिखते हैं मुदा टिप्पी में केतना गहरा बात कह देते हैं । अब ई पर का टिप्पा फ़िट करें जब आप बाते एकदम सौ प्रतिशत सही कह दिए हैं । हां उसको का राज खुलासा करने के लिए टीम भिड गई है जल्दी ही पूरी बात पता करके बताया जाएगा । उ भी हंसता रोता है ..ई बात मार्के की कही आपने ।

लंठ जी की कविता कवि भी की पोस्ट पर

शरद कोकास ने कहा…

जैसे खेल रहे हों बच्चे/आँखमिचौनी गरीब के .. राव साहब इस बिम्ब पर मैं कुर्बान जाऊँ ...।

टिप्पा :- शरद भाई ....खुद को संभाल के रखिए ई राव साहब तो कातिल हैं एकदम घातक टाईप के इनका गद्य से बचे त्प पद्य पर जान जाना एकदम पक्का है .....इसलिए कुर्बान होने को तैयार ही रहना पडता है । हम तो रोजे मरते हैं ...फ़िर रोजे भूत बनके इनको पढने के विचरते हैं ।

भाई काजल कुमार जी ने पाकिस्तानियों को गौरिया दिवस मनाते पकडा तो

ताऊ रामपुरिया, March 21, 2010 7:58 AM
अबे बेवकूफ़ ठोक मत...इसको जेल में डाल दे... इसके बदले ५० लोग अपने छुडवाने के काम आयेगी.
रामराम.

टिप्पा:- हा हा हा ..सही कहा ताऊ अब तो हमारी गोरैया ..हमारे टाईगर भी इनके बंदे छुडाने के काम आ सकते हैं । मगर मुश्किल ये है कि कम्बख्त मिलें तब न ....१४११ चलाने के बाद तो टाईगर सब सुने हैं कि अपना ऐटेंडेंस डेली मार्क करवा रहा है ....गोरैय्या सब के लिए भी एक ठो रजिस्टर बना लिया जाए ......और एक ठो गोरैय्या पर एक ठो कसाब ..एक ठो दूसरा गोरैय्या पर ..एक ठो अजमल फ़्री का स्कीम जल्दी ही भारत सरकार चलाने जा रही है ।

गिरिजेश जी की आलस पर

Aashu ने कहा…

टिप्पणी पर आपने कुछ सवाल उठाये हैं. एक सोच हमारी भी. कई सारे ब्लॉग पढता हूँ, कुछ लिखता भी हूँ. टिप्पणियां भी पढता हूँ. ज्यादातर ब्लॉग के टिप्पणी में देखता हूँ कि लोग बस 'सुन्दर', 'अच्छा' या 'nice' कह कर निकल लेते हैं. ब्लॉग के विषय पर, उसमे उठाये गए मुद्दे पर अपनी भावनाएं लोग कम ही लिखते हैं. क्या ये नहीं होना चाहिए कि लेखनी की तारीफ़ से ज्यादा उस लेखनी पर चर्चा हो टिप्पणियों के माध्यम से.
खैर, रविवार की सुबह की तो बात ही कुछ और है. आज आँखों ने खुलने से ही इनकार कर दिया. 7 बजे से अभी तक ढेरों प्रयत्न कर चूका था. अब जब पिताजी की झाड पड़ी है तभी उठ सका हूँ. :)
अंशुमान, http://draashu.blogspot.com
टिप्पा: - आशु जी पहले तो ई क्लियर किया जाए कि पिताजी की डांट से इंस्पायर होके आप काहे के लिए सबको इत्ता सीधा सीधा सपाट टिप्पी क्लास ले लिए ? और हां ज्यादातर लोग एक शब्द से काम चला रहे हैं ..तो किया का जाए ..और काम नहीं है का ...फ़िर सबसे अधिक टिप्पणियों में तो स्माईली भी काऊंट होता है जी । हां जईसन टाईप का शास्त्रार्थ आप ढूंढ रहे हैं न टिप्पणी -प्रतिटिप्पणी और पोस्ट के बीच वाला उ तो आजकल बस एक खास टाईप के पोस्ट पर ही देखने को खूब मिल रहे हैं ॥

अलबेला खत्री जी की पोस्ट पर

मयंक March 21, 2010 11:06 AM
बेनामी कमेंट से है, ब्लॉगजगत हैरानखुद तो हैं ही, करते हैं सबको ही परेशानकरते हैं परेशान, दुखी पर खुद ही होएंरात रात भर कुढ़न के मारे न ये सोएंबेनामी से कभी न डरना, ब्लॉग के स्वामीसारे कायर लोग लिखें, नाम बेनामीबाकी खत्री जी तारीख दे ही दी है...वक्त और जगह भी जल्द ही बता दें....हम तो खैर खाली हैं चले ही आएंगे....मयंक सक्सेना

 

टिप्पा : - का मयंक भाई ..जब लोग बेनामी सबको टोकरिया भरभर के गरिया रहा है ...ससुर बेनामी सब भी खाली गरिया ही रहा है ..ऐसे में आप इतना सुंदर श्रद्धांजलि दे रहे हैं उनको ऊ भी काव्यात्मक टाईप ...बताईये फ़िर भला ..बेचारा काहे के लिए मां बाप का दिया रखा नाम उपयोग करेगा ..आखिर लावारिसाने का भी कोई लुत्फ़ होता है कि नहीं ???

ललित जी को जन्मदिन की बधाई देते हुए हम खुदे टीप मारे हैं :-

अजय कुमार झा,
वाह आज तो बल्ले बल्ले ..ललित जी को उनके मूंछों के जन्मदिवस की बहुत बहुत बधाई ..जी हां ये सच है ..हमारी खास रिसर्च टीम ने पता लगाया है कि ..इत्ती बडी मूंछों का असली राज यही है कि ये उन्हें बचपन में ही प्राप्त हो गई थी ...इसलिए ललित जी को और उनकी मूंछों को भी बधाई .. अजय कुमार झा

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

होलिया में भर गया रंगों का पीपा , कौन भंगिया के कहां पे टीपा …फ़िर हम बनाए टैण टैनेन ………

 

पिछले दिनों जो सब हुआ उसको एक दम धना धन गोली मारते हुए हमने सोचा कि कुछ अपना और आप सबका भी मूड बनाया जाए ..सो धर दिया आपकी टीपों पर वही टप टप टपाक ..यानि टैण टैनेन

 

दीपक के मसि कागद पर दीपक की कान खिंचाई चालू आहे

 

निर्मला कपिला said...

वाह वाह मै भी कहूँ कि इतने दिन से बच्च कहाँ गायब है तो सब को धुनने की तयारी कर रहे थे--- कमाल की पोस्त {पोस्ट] बनी है सब को एक एक डोडी खिला कर मस्त कर दिया। कमाल की पोस्ट है। बस इसी नशे मे होली मना रहे हैं सब। बहुत बहुत आशीर्वाद।
हाँ बिना बताये गायब होते हो तो चिन्ता लग जाती है आज तुम्हारा फोन आया तो तसल्ली हुयी। खुश रहो

टिप्पा टैण टैनेन :- अरे निर्मला जी ई बच्चा बहुत शैतान मासूम है ..गायब हो रहा है तो  समझिए कि लगा होगा कौनो खुराफ़ात में ..ओईसे भी होली का टेम है ..कौनो मेम को गोरा से रंगीन करने मे लगा होगा ..तभिए देख रही हैं न कईसे सबको दुलाईना में लपेट कर रख दिया …..फ़ोन तो हमको भी किया था आजे…कह रहा था हैप्पी होली जी

सतीश सक्सेना जी ने कहा लाईट ले यार तो :-

अनूप शुक्ल said...

आजकल हर गुर के साथ नमूना मांगा जाता है! आप एक सफ़ल ब्लॉगर हैं। जो गुर बताये उस तरह आपने यदि कोई पोस्ट लिखी हो तो उसका लिंक बतायें! कौन से ब्लॉगर आपके भक्त बने उनका भी अता-पता दें तो अति उत्तम!

 

टिप्पा टैण टैनेन :- लीजीए  जब पहिले ही सतीश जी कह रहे है कि लाईट ले यार …मतलब एकदम हल्के से ले न यार ..तो एतना हेविया के काहे लिए जी फ़ुरसतिया जी …आजकल हर गुर के साथ नमूना मांगा जाता है ..अच्छा ई सेंपलवा देना जरूरी होता है का ….हमें तो लगा कि कहिएगा कि हर गुड के साथ एक ठो अईसन चेला का नमूना दिया जाना चाहिए जो ई चरितार्थ कर सके कि गुरू गुड ही रहे चेला चीनी हो गए …..इहां भी लिंक  ढूंढ रहे हैं …..ई सब चर्चाकार सबको सब जगह लिंके काहे बुझाता है बताईए तो तनिक फ़ुर्सत से

देशनामा पर pspo को भलीभांति समझते समझाते  हुए

 

डा० अमर कुमार said...


वर्ष के पहले हफ़्ते में मैंने गलत तो नहीं कहा था,
कि अक्सर तुम मेरी सोच को स्वर दे ही देते हो,
सो मैं आलसी हो गया हूँ । लिखना ऊखना कुछ नहीं बस बैठे बैठे टिप्पणियाँ फ़ेंकते रहो ।
इस पोस्ट ने एक बार फिर तसल्ली दी है,
मैंनें मसिजीवी की वह पोस्ट पढ़ी तो थी, टिप्पणी देकर उनकी टी.आर.पी. बढ़ाना नहीं चाहा । मुझ सा अहमी कोय, सो मैं स्वयँ ही अहँवादियों से बचता हूँ ।
GHETTO; इसका अपने साथियों के सँदर्भ में प्रयोग किया जाना मुझे भी नागवार गुज़रा । मूलतः स्पैनिश से उपजा यह शब्द नाज़ीयों ने अपना लिया क्योंकि यह परिभाषित करता था कि A slum inhabitated by minority group isolated due to social or economic pressures. ज़ाहिर है कि नाज़ी इसे जिस सँदर्भ में उपयोग किया करते थे वह तिरस्कारात्मक ही था ।
इस शब्द ने अमरीका तक की यात्रा में अपना चरित्र और भी मुखर किया । आज भी यह अपने तिरस्कारात्मक चरित्र को ही जी रहा है ।
हड़काऊ तर्ज़ पर यदि मात्र फ़ैशन के तौर पर इसे उछाला जाता है, तो भी कौन कहता है कि फासीवाद मर चुका है, या कि शब्दों में जान नहीं होती ?
तुस्सी साणूँ दिल खुश कित्ता खुशदीपे !

टिप्पा टैण टैणेन :- ई का कह रहे हैं महाराज डागदर बाबू हो …..लिखना उखना कुछ नहीं …..एक ठो बात बताईये तो ..आप जौन ही आधा आधा मील तक टिप्पिया रहे हैं ….आजकल तो बहुत लोग ईत्ता लंबा चौडाई में दुई ठो पोस्ट ठेल देते हैं तबो आप कह रहे हैं कि लिख नहीं रहे हैं …चलिए आप कहते हैं तो मान लेते हैं …ई ससुर घेटो को आज खूबे लपेट के घेंट पकड लिए ….हम तो सोचे थे कि डागदर बाबू हैं तो खाली नबज उबज पकड के बीमारी पकडते होंगे …मुदा आप तो घेंट पकड लिए और सीदा पटक दिए …..जय हो

ताऊ जी की पहेली को हल करते हुए

 

पी.सी.गोदियाल

Saturday, February 27, 2010 9:01:00 AM

ताऊ जी, सर्वप्रथम आपको और सभी मित्रों को
होली की शुभ कामनाये ! आपने मुझे बड़ा वाला प्रमाण पत्र न देने की तो कसम खा रखी है फिर भी बताये देता हूँ दिल्ली का छतरपुर मंदिर है !

टिप्पा टैण टैनेण :- हां हां आपको तो एतना बडका थाल तशतरी टाईप का भिजवाएंगे कि आप उसको अपने ब्लोग पर का अपने छत पर टाटा स्काई बना के लगा सकते हैं …लो कल्लो बात ..अरे गोदियाल जी ई भी पूछने वाला बात है ..इत्ता गलत जवाब देते हैं कि सुने हैं कि रामप्यारी भी मार शरम के ..अपना नंगरी उठा के चार बार घूम के लोट जाती है और कहती है कि ताऊ गोदियाल जी से कहो न कभी तो ……बाबा के मंदिर को देवी का मंदिर बता देते हैं

मिसर जी के कठिन नाम .वाले ब्लोग .अजी वही क्वचिदन्यतोअपि पर टिपियाते हुए

 

बी एस पाबला said...

मीनू पर लिखी वही सूची पोस्टर के बड़े अक्षरों सी साफ़ दिख रही थी
हा हा
इसे कहते हैं आंखें खुलना। पनीर ने बंद कर दी थीं ना!
रोचक संस्मरण
बढ़िया

टिप्पा टैण टैनेन :- आयं इत्ता भारीभरकम नाम रखे हैं मिसर जी हम लोगन को पसीना छूट जाता है ..ऊ ससुरे मीनू वाले को भी कह देते कि बेटा पहले बोल के बताओ ..फ़िर निपटाएंगे तुम्हारा क्वार्टर आउर फ़्लैट ….पनीर से आंख बंद ……ओह ई साईंस का बात हमरे पल्ली कभी नहीं पडता है जी …हम इता दिन सोच रहे थे कि पनीर से खाली पेट बंद होता है ….

राजीव तनेजा जी के होली फ़ैशन परेड में भाग लेते हुए :-

ललित शर्मा said...

हाय! खुशदीप बहना,
कितनी क्युट लग रही हो,
एकदम झकास, घायल कर दिया।
मुकुल बहना!
क्या अदा है क्या स्टाईल है
एक हाथ मे पॉडकास्ट
एक हाथ में मोबाईल है।
अब कैसे कोई हाथ मांगे
दोनो ही इंगेज है
बस जरा सी ठिठोली है।
बुरा न मानो हो्ली है।
राजीव जी बधाई हो
सभी हसिनाओं रुपसियों को होली की शुभकामनाएं।

टिप्पा टैण टैनेण :- ई खबर उडते उडते सुने थे कि एक ठो फ़ौजी ब्लागर एतना भां घोंट के पी लिए हैं कि ,…जाने केकरा बहना , सखी , सहेली बना दे रहे हैं ….ओईसे तो कसूर फ़ौजी मुछु बाबू का भी नहीं है ..ई अपने राजीव भाई टोकरी भर भर के लिपिस्टि पाउडर सिनुर टिकली ले के बैठ गए हैं और जाने कौन टाईप का नारी सशक्तिकरण करने पर तुले हुए हैं होली जाने तक तो जाने कित्ती ही मजबूर मूंछों वाली हसीनाएं …पैदा हो जाएंगी

फ़ुरसतिया जी के बिलाग पर भूत पटक…… घोस्ट बस्टर गहन टाईप विशलेषण करते हुए

 

Ghost Buster

February 27, 2010 at 12:22 pm | Permalink

महिला टेनिस, पुरुष टेनिस से ज्यादा आकर्षक होता है. पुरुष टेनिस में तो पॉवर गेम ने खेल का आनंद क्षत-विक्षत कर दिया है, पर महिलाओं में बावजूद विलियम्स बहनों के अभी भी कई अच्छी कलात्मक खिलाड़ी दिख जाती हैं.

महिला हॉकी भी देखना रोचक रहता है. शायद ही कोई खेल हो जहां महिलाएं अपने जौहर ना दिखा रही हों और बखूबी ना दिखा रही हों, यहां तक कि लेडीज़ सॉकर तक में जबर्दस्त खेल देखने को मिलता है.

लेकिन क्रिकेट में महिलाओं को खेलते देखने से ज्यादा डल और बोरिंग और कुछ नहीं हो सकता. क्रिकेट अपने मूल चरित्र में ही एक सुस्त खेल है. उसमें अगर कोई असली आकर्षण भरता है तो वो या तो सचिन, सहवाग जैसे बड़े हिटर हैं या ब्रैट ली, शेन बांड जैसे तूफ़ानी गेंदबाज. महिला क्रिकेट में ये सब नहीं देखने को मिलता. इसीलिये वहां ज्यादा आकर्षण नहीं बनता. उसकी अलोकप्रियता की यही वजह है.

तो फ़िर महिला क्रिकेट के रिकॉर्ड्स को कोई तवज्जो दे भी क्या? हां सचिन की इस अन्यतम उपलब्धि को पंक्चर करने के लिये ढूढ-ढांढ कर फ़ालतू के तथ्य लाये जा रहे हैं, बेवजह. मूर्खतापूर्ण.

 

टिप्प टैणेन :- आयं ये क्या खेल प्रेमी भूत पटक ….कित्ती गहरी पकड है जी आपकी और क्या पारखी नज़र है ..एक दम कसम से से इस नजर को किसी बजर बट्टू की नज़र न लगे ….एक दम ठीक कहा आपने सुना है कि लोग कह रहे हैं कि महिला क्रिकेटरों से ज्यादा आकर्षण तो …महिला चीयर गर्ल्स में महसूस होता है मीडिया को………….अब पता चला कि प्रेत भी कित्ता सोचते हैं …..मतलब मरने के बाद  यहां पढने और टिपियाने के लिए आना ही होगा …..

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

आप टीप के निकल जाते हैं, हम उसे यहां टिकाते हैं

 

भाई खुशदीप के देशनामा पर

Udan Tashtari said...

मेहमान-ए-खुसुसी :)
राज जी और कविता जी की उपस्थिति ने आयोजन को अन्तर्राष्ट्रीय बना दिया जी.
एक ही साल में यह असर खुशदीप ब्लॉगिंग का की यंगनेस जाती रही..अब समझ में आ रहा है मुझे अपने लिए कि चार साल में मेरी क्या दुर्गति हुई है वरना मियाँ, हम भी जवानों के जवान थे कभी. :)
महफूज़ की शादी तो खैर कई वजहों से जरुरी हो गई है, उसमें यह वजह और आ जुड़ी. अब तो मार्जिन बहुत बारीक बचा है. :)
दराल साहब का हरियाणवी किस्सा जोरदार रहा!
सरवत जमाल साहेब की उपस्थिति उल्लेखनीय रही. हमारे गोरखपुरिया भाई जी हैं.
खाने से ध्यान हटाने की कोशिश में अपना नाम और उल्लेख ठीक खाने के मेनु के बाद देखना कितना सुखद रहा कि क्या बताऊँ..सब आप लोगों का स्नेह है.
सब देख सुन कर आप सही कह रहे हैं हिन्दी ब्लॉगिंग के बढ़ते कदमों को कोई नहीं रोक सकता.
जय हो हिन्दी!! जय हो हिन्दी ब्लॉगिंग!! जय हो हिन्दी ब्लॉगर्स!!

February 8, 2010 11:51 PM

 

हमारा टिप्पा:-…बिल्कुले ठीक कहे हैं आप कि दुनो जन राज भाटिया जी और कविता जी के आने से हम लोग का मीट इंटरनेशनल लुक मिल गया , बस एक आप जाते तो हम लोग एस्ट्रोनौटिकल मीट कर लेते …..और गजब का शोर मच जाता कि …….इंसानो और एलियन जी ने भी आपस में की ब्लोग्गिंग मीट ।……..ई महफ़ूज़ भाई की शादी और भी बहुत कारण से जरूरी है ……अरे तो हमको समझ में नहीं आता कि ई महफ़ूज़ भाई अपनी लाईफ़ में से ई मोडरेशन काहे नहीं हटाते हैं ?? खाने के मीनू के बाद आपका नाम आया ……….एक दम ठीक आया ….उससे पहले आता तो ……बचता का ………न मीनू….न खाना ? केतना ध्यान रहता है ….भोजन पर । आईये आपके वाले ब्लोग्गर मीट में तो खास तौर से ब्लोग्गर व्रत मीट ( बताईये …व्रत और मीट ..एक साथ राम राम ) रखा जाएगा ॥

 

हमारे अपने ब्लोग पर :-

 

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

एक दुकानदार किस्तों में सायकिल बेच रहा था। हमने उस से सौदा कर लिया। बस दस रुपया हफ्ता चुकाना था। हमने पहली किस्त के दस रुपए दिए। और कहा सायकिल कस दो। उस ने दस रुपए लेकर रसीद पकड़ाई और दुकान के अंदर से सायकिल का एक पैडल लाकर बोला। हर किस्त में एक आइटम दूंगा किस्तें पूरी होने पर पूरी सायकिल कस दूंगा।
अजय भाई अब लगता है कि किस्तें पूरी हो जाने पर रिपोर्टे को पूरी कस के एक बार और पढ़ना पड़ेगा।

 

हमारा टिप्पा:- का सर , ई कौन शहर में ई दुकान है बताईये तो , पता करिये न तनिक हफ़्ता में बीस रुप्पैया देने पर एक ठो स्कूटर लेना था । और कार वाला किस्त बता देते तो हम राज ग्वालानी भाई को कह देते एतना दिन ऊ बेकार न रहते खैर ।…हा हा हा …..हम भी सबसे आखिरी में हैंडल देंगे ….बिना उसको कसे आप आगे नहीं बढ पाईयेगा ।

 

रश्मि रविजा के ब्लोग पर :-

 

Arvind Mishra said...

हिंदी को समृद्ध करने के लिए दूसरी भाषाओं के शब्द भी समाहित करने चाहिए.सिर्फ अंग्रेजी ही नहीं अगर संभव हो तो स्पेनिश,फ्रेंच,इटैलियन शब्द भी शामिल करने चाहिए.
बस यही है बाटम लाईन!

February 8, 2010 7:17 AM

हमार टिप्पा :- कि मिसिर जी , हमको पकिया आप कंफ़्यूजिया दीजीएगा । लोग बाग लिखेंगे स्पेनिश, फ़्रेंच , इटैलियन में , और पाठक ऊ पर टीपेंगे चाईनीज़ , जापानी, हिब्रू में …..और उस पर हम टिप्पा लगाएंगे …..भोजपुरी , मैथिली , संस्कृत में । एक ठो मलटी नेशनल , मल्टी लैंग्वेज, मल्टी डिलिशियस ……औरो जेतना टाईप का मल्टी है सब पलटी मार के आएगा उसमें ॥

गोदियाल जी के अंधड पे :-

 

पी.सी.गोदियाल said...

ताउजी, फिर तो अगली ब्लोगर मीट सियाचिन में न रख ले, हफ्ते भर के लिए :)

February 7, 2010 10:26 PM

 

ताऊ रामपुरिया said...

गोदियाल जी मैं आपके प्रस्ताव का समर्थन करता हूं. समय दिनाकं तय करके पोस्ट द्वारा सभी को सुचित किया जाये.
रामराम.

हमारा टिप्पा :- ई का हो रहा है भाई । ई माजरा का है ? आयं ई एक जन प्रस्ताव दिये दूसरा जन समर्थन दे दिए और चल दिए दुनु जन सियाचिन पर ब्लोग्गर मीट करने । अरे आप दुनु चाचा ताऊ लोग हम बच्चा लोग के बिना कैसे जा सकते हैं जी । ऊ भी मोटापा कम करने के नाम पर । ओतेरे कि तब तो आप लोग जौन मीट करियेगा …उसमें जरूरे खाने पीने के लिए खाली ताजा हवा पानी मिलेगा ।………सुन रहे हैं न एलियन जी ….??? रामप्यारी भी हमरे साथ है । चलिए चीनी लोग के साथ भी होईये जाए एक ठो ब्लोगर मीट

ललित जी के ब्लोग पर :-

महफूज़ अली९ फरवरी २०१० ९:३५ AM

ओह! शुरुआत में आपने तो डरा ही दिया था..... मैंने अपना लाठी -बल्लम निकल लिया था.... फिर बाकी पढ़ा तो चैन आया..... पर इसी बहाने लाठी-बल्लम बाहर निकल आये.... उनको तेल पिला कर..मालिश वालिश कर के.... बरसात में धूप दिखा रहा हूँ.....
दस दिन तक आपकी कमी खलेगी.... पर मोबाइल है ना..... :)

हमारा टिप्पा :- अरे रे ! का ललित जी । ई अपना महफ़ूज़ भाई तो पहिले से ही लाल कच्छा पहन के सांड को गज़ल सुनाने के लिए तैयार रहते हैं , ऊपर से आप अईसन अईसन लीव एप्लीकेशन दीजीएगा तो ..लाठी बल्लम निकलबे करेगा । बताईये इहां तेल लगाने को नहीं है एक ऊ हैं नवाब साहब लठिया सब को ही पिला रहे हैं । एतना दंड काहे पेलते हैं जी …तभी न टरेन छूट जाता है ।अरे एतने बडका पहलवान हैं तो काहे नही wwf  में चले जाते हैं …..अरे मतलब गृहस्थ जीवन में जी और का

अजित जी के शब्दों के सफ़र पे :-

अविनाश वाचस्पति said...

वैसे भी अंगूर में अ है
इसलिए भी अच्‍छे हैं
आम में भी जुड़े हुए
अ के लच्‍छे हैं
खजूर का ख
उसे खट्टा बनाता है
और आंवला, इमली, अमचूर की
उपयोगिता बतलाता आपका सफर
सदा खट्टे मीठे का अद्भत स्‍वाद
मन में भीतर तक बहाता है।

February 9, 2010 7:22 AM

हमार टिप्पा :- ई लीजीए अजित भाई के शब्दों के सफ़र की क्लास में अविनाश भाई का ट्यूशन किलास …..फ़्री फ़्री फ़्री …..का धांसू औफ़र दिए हैं जी । तो पहुंचिए फ़टाफ़ट और सीखीए अ…..से अनोनोमस , ब से ब्लोग्गर …प से …पोस्ट….ट ….से टिप्पी …., टं ….से टंकी ….सफ़र जारी है ॥

ब्लोग औन प्रिंट की इस पोस्ट पर हम खुद :-

ब्लॉगर अजय कुमार झा ने कहा…

हा हा हा सर मैं इस बात की बधाई और मुबारकबाद सभी मित्रों और पूरे ब्लोगजगत को देता इससे पहले ब्लोगवाणी पर देखा कि ......आपके डेडिकेटेड ...मि. नापसंद ..अपना काम कर के जा चुके हैं ...यानि उन्हें ये भी नापसंद आया ...हा हा हा ..अभी हंस लेता हूं ..बाकी बातें बाद में
अजय कुमार झा

८ फरवरी २०१० ७:३२ PM

हटाएँ

हमार टिप्पा :- लो कल्लो बात अब ई हम अपने कहे पर ही टिप्पा दें ,  मुदा कानून तो कानून है ….सबके लिए बराबर और सबके लिए ही अंधा । अब का करें हमको लगता था कि हम लोग केतना डेडिकेटेड टाईप से घुसे हुए हैं ब्लोग्गिंग में । जब देखो पोस्ट टीप , टीप प्रति टीप , मीट ……..मीट मसाला …..मुदा जब से ई मि. नापसंद जी आए हैं ब्लोग्गिंग करने तभिए से सबको हिट सुपर हिट किए दे रहे हैं । कभी लोग बाग अंगूठा उठा के थ्म्स अप किया करते थे । अब ई साहब ..अंगूठा डुबा के पोस्ट अप करा देते हैं सबका

रविवार, 24 जनवरी 2010

ट्विस्टिंग टिप्पे……जैसे गोलगप्पे

सबसे पहले तो अपने अग्रज भ्राता श्रीमान टिपौती लाल झारखंडी जी का बहुत बहुत धन्यवाद कि ऊ सागर मंथन के तर्ज़ पर ब्लोग्गर मंथन करके ई नयका टेम्पलेट सलेक्ट करके सेट किए हैं , बस बताया जाए कि कैसा लगा …लगा न जोर से करेगा में ठां करके

 

खुशदीप भाई के देशनामा पे

 

 

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मियाँ जी, बहुत ज्ञानी हैं। अभी अभी पैदा हुए और ज्ञान दे गए। अभिमन्यु का तो पता था कि वह किस के गर्भ से पैदा हुआ और किसने उसे यह ज्ञान दिया। यह तो सच है कि कोई तो मियाँ जी को ज्ञान देने वाला रहा ही होगा।
इतना ही काफी है। मुझे तो सांख्य का तीसरा तत्व अहंकार'स्मरण' हो रहा है। समूची सृ्ष्टि का वही सूत्रधार है और अक्सर मानव मन में अनायास प्रकट होता रहता है।

January 23, 2010 11:49 PM

हमारा टिप्पा : मियां जी को गजबे लीगल सलाह दे दी ओकील  साहब ने , हम सोच रहे हैं कि ई बेचारे इलीगल मियां को एतना लीगली पटक दिए  कि अब चिचियाते फ़िर रहे होंगे । सुना है कि लोग बाग एतना चैलेंज़ कर दिया कि अब ऊ बर्थ प्रमाणपत्र बनवा रहे हैं । बनते ही खबर किया जाएगा । अभी तो न प्रमाण मिल रहा है न कौनो पत्र ….बेचारे मियां जी

शशिभूषण जी के ब्लोग पर :-

 

काजल कुमार Kajal Kumar said...

फिर भी लोग हैं कि हाज़िरी बजाने चले रहते हैं \:)

January 23, 2010 10:55 AM

हमारा टिप्पा: का काजल बाबू ई कहिए न कि लोग बजाने चले जाते हैं , हाजिरी उजरी का तो पता नहीं मुदा बजा तो दईये देते हैं , कभी बैंड तो कभी पीपनी । ओईसे काजल भाई इहां तो ठीके है मुदा सुने हैं कि आप भी सबको एके वक्र दृष्टि से देख के बजा देते हैं ,ठीक है का ? अरे बाप रे कहीं यहां भी …..अईसन न हो कि काजल की ………कंप्यूटर काला ॥

स्मार्ट इंडियन जी के ब्लोग पर :-

गिरिजेश राव said...

शुभकामनाएँ भैया।
मेरे एक और भैया हैं जो अक्सर उन अकादमिक लोगों के बारे में बताते हैं जिन्हें संस्कृत का क ख ग भी नहीं आता और प्राचीन इतिहास एवं दर्शन के आचार्य बने बैठे हैं। उनका सारा शोध अंग्रेजी कुंजियों (शिष्ट भाषा - भाष्य) पर आधारित होता है और रोमन ट्रांसलिटरेशन में मूल को क़ोट करते हैं। पढ़ने को कहने पर अटकते हैं :)
अगली कड़ी की प्रतीक्षा है।
आत्महत्या के समय 'हिम्मत' नहीं क्षणिक उद्वेग या कई दिनों से जारी अति निषेधात्मक मनोभाव काम करता है इसीलिए पहचान और कौंसिलिंग महत्त्वपूर्ण है।

 

हमार टिप्पा : का कह रहे हैं प्रभु आपके भी भैय्या हैं एक ठो ….दद्दा रे दद्दा , बाप रे बाप , ऊहो आलसी हैं का ….अरे लंठ तो होईबे करेंगे , ब्लोग्गिंग में तो नहीं न आए हैं , आ गए तो बस समझिए गए जब उनका बताया मात्र से एतना घातक टीप निकल गया है तो ….आने के के बाद तो सब टैणेण हो जाएगा । आपका टीप भी हमको तो , कौनो बाऊ कथा से कम नहीं लगता है ॥

अदा जी के काव्यमंजूषा पर :-

manu said...

अभी पिछले दिनों अपने मेजर साब के साथ भी एकदम ऐसा ही हुआ था अदा जी...
जब हमने कमेंट दिया के आज के दिन तो आपकी पोस्ट आती ही नहीं है...तब जाकर उन्हें पता लगा...के एक पोस्ट समय से पहले ही खुद बी खुद छप गयी है....
इस गूगल बाबा के झमेले गूगल बाबा ही जाने....
इहाँ कुछ भी हो सकता है जी...

January 23, 2010 6:52 PM

हमार टिप्पा :- अरे ई गूगलवा जब देखो अईसन गडबड करते रह्ते हैं , कुछो ढंग का तो करते नहीं है ,ई तो होता नहीं है कि गूगल एडसेंस शुरू कर के बच्चा सब का भला करें अरे काहे के बाबा हैं यार एकदम बेकार है । बाबा से कहा जाए कि बाबा गडबड होती है कोई बात नहीं आल इज वेल ,,,मगर कुछ तो नकद भी ,,,फ़ुनसुक वांगडू न सही …चतुर रामलिंगम ही सही

हमरे ब्लोग कुछ भी कभी भी :-

 

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छी सलाह!! इधर कुछ तबीयत भी नरम गरम सी है तो ज्यादा नये लोगों पर ध्यान भी नहीं दे पा रहे लिकिन इस दायित्व की तरह सभी को लेना चाहिये कि प्रोत्साहन दें.

२४ जनवरी २०१० ८:३३ PM

हमार टिप्पा :- ओह तभिए हम कहें कि ई ब्लोग्गरवा सब ई कंप्लेंट काहे कर रहे हैं कि कोई ब्लोग्गर तो ब्लोग्गर एक ठो मोस्ट आईडेन्टीफ़ाईड ओब्जेकट ,,,कोई एलियन जी भी टिपियाने नहीं आ रहे हैं , सब का सब मुंह बाए बैठा है बेचारा लोग ।ई दायित्व कौन ले सकता है , अजी इंसान लोग के बस है का एतना विचरन करना । आप लोग का भी तबियत खराब होता है ….यार ई एलियन लोग का डाक्टर कैसा होता होगा ….भारी सोच में पड गए

गिरिजेश राव जी के ब्लोग कविता और कवि पर :-

 

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

आप तो 'ऋषि' हुए न !
मंत्र द्रष्टा जो होता है ठीक वही ! ... हमें भी मुनि ही / भी बनाइये न !
बचपन का दवात वाला बिम्ब जिसमें स्याही घोली
जाती थी , याद आ गया .. आभार , साहब !

२४ जनवरी २०१० ६:३६ PM

हमार टिप्पा :- लीजीए ई भी ठीक रहा त्रिपाठी जी , आलसी , लंठ तो हईये थे आज आप एक ठो नयका नाम भी धर दिये इनका रिषि मुनि । ई एतना शब्द साधाना करते हैं कि इनका नाम मुनि तपस्वी टाईप का होना कंपल्सरी हो गया था । आपहु मुनि जी बनना चाहते हैं बनिए बनिए ,,,,फ़िर हम लोग बाबा जी वर्सेस मुनि जी का ट्वेंटी मैच कराएंगे और टिकट भी लगेगा , मैच की सारी राशि ब्लोग्गर पेंशन फ़ंड को दान में दी जाएगी । व्हाट एन आईडिया सर ॥

बिल्लन के खेल खुल्लम खुल्ला फ़र्रुखाबादी पर

Yashwant Mehta said...

एक सासु अपनी बहु से बोली
मेरा बेटा शादी से पहले कुत्ता था, शादी के बाद गधा हो गया

24 January 2010 19:48

हमार टिप्पा :- यार ये तो हर एंगल से मरदावा सब को ऐनिमल बना दिया है । ओईसे गधा कुत्ता दोनों ही बेचारा टाईप है जो फ़ट से बियाह के लिए मान जाता है । मगर यार यशवंत भाई एक बात तो बतईबे नहीं किए कि शादी के बाद प्रमोशन होता है कि डिमोशन । रहता तो बेचारा एनिमल प्लेनेट चैनल का हीरो ही ॥

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

एक ब्लोग कहानी में एक टिप्पी होती है , एक टिप्पा होता है

आज तेताला पर नए चिट्ठों की चर्चा की शुरूआत तो मैंने कर दी है , उम्मीद है कि आप सबको वो पसंद आएगा ,और अब ये टिप्पणी चर्चा भी आ गई , अब तो आप बस रफ़्तार देखते जाईये और नए अंदाज़ भी , लीजीये मजा टिप्पों का


बाबा समीरानंद जी के ब्लोग प्रवचनमाला में

Udan Tashtari said...

जय हो बाबा ताऊआनन्द महाराज की. बहुत बढ़िया प्रवचन रहा ललित जी की जिज्ञासा निवारण के लिए.

रचना जी किन बच्चों कें विषय में बात कर रहीं हैं, जरा पता करियेगा.

साधु सन्त किसी के विरोधी नहीं होते. वो तो जीवन जीने का मार्ग बताते हैं.


जय हो!! जय हो!! जय हो!!


हमारा टिप्पा :-का हो उडन जी , ललित जी के प्रश्न सुन के ही मन एकदम ललित (प्रसन्न ) हुई गया। ऊपर से बाबा जब अपना परवचन दिए रहे तो लगा कि चलो कौनो तो है जो बच्चा सबको सीख दे सकता है । अरे बच्चा सब समझ रहे हैं न , कि ई में मौज मौज में बच्चा सब को लुच्चा सब मत न समझ लीजीएगा । अरे जान रहे हैं कि आप ई सोच रहे होंगे कि ई झाजी बार बार समझ रहे हैं न .....समझ रहे हैं न ....काहे कह रहे हैं अरे आप ठहरे एलियन ..जब देखो विचरते रहते हैं ...........इहां तो लोग जैसे ही फ़ुर्सत में आए कि ........बस टैण टैणेन ...टैनेने टैनेने ...का फ़मझे जी

गिरिजेश राव जी, अरे उहे आलसी लंठ जी के ब्लोग कवि और कविताएं पर
Arvind Mishra ने कहा…

सुबह सुबह ही विद्युत् स्पर्श करा ही दिया न भाई ....शब्द शब्द स्फुलिंग ...
.क्या कहूं -बड़े होने की गरिमा का भी तो खयाल रखना है ....
अब आपके टिप्पणीकार निश्चित ही घटेगें -सांत्वना यह कि पाठक बढ़ेगें !
क्या चाहिए वत्स तुम्हे ,पाठक या महज टिप्पणीकार ? अब तुम हो अपनी नियति के निर्णायक


हमारा टिप्पा :- का मिसर जी गोया आप तो ऐसे न थे, बताईये तो लंठ बाबू को पूछ रहे हैं कि बताओ भैय्या विक्रम कि बेताल .....कौन पढे सब हाल ??मुदा जब भी टिप्पणीकार की बात होती है ई आप लोग हमको भूल के .....अरे आप तो मिश्रा /चौधरी/ को भी भूल कर पाठक जी को कमान दे देते हैं संभालने के लिए । और ई गिरिजेश बाबू से पूछने का कौनो फ़ैदा है का । अरे ऊ जो बाऊ कथा बांच रहे हैं उ सबके बस का समझना है का । हम तो उनको कहिए दिए हैं कि चाहे कौनो पाठक /झाजी आ कि कौनो पाजी पढे न पढे, समझे ....मगर वो हिंदी ब्लोग जगत के एक धरोहर तो हईये हैं ....एक ठो आलसी धरोहर ...॥


कस्बा में ऐसा कहा श्री जे सी ने :-

JC said...

दारू से याद आया की कभी एक कव्वाली सुनी थी, जिसमें उन्होंने पुलिस के 'पी' का मतलब समझाया था, जैसे दिल्ली के डीपी का मतलब 'डेली पी', पंजाब के पीपी का मतलब 'पी', और फिर फिर 'पी', आदि आदि समझाया :) टीवी पर भी कई बार एचपी के द्वारा 'हदसे ज्यादा पी' के दृश्य देखने को भी मिले हैं - उसको सार्थक करते हुए :)


हमारा टिप्पा :- का जे सी साहब , दारू से याद आया , का जी मुआं ई दारू न हुआ बदाम का टौनिक हो गया जी आयं । आउर याद का आया , पी माने पी , पीपी, डीपी, सीपी ,........माने पी का तो कंपल्सरी मीनींग तो सिर्फ़ दारू ही हुआ न । ओइसे इस हिसाब से अपने टिप्पी का मतलब हुआ ........टी माने टीपो ...और पी माने ...फ़िर मन करे तो पढ भी लो ....इसे ही कहते हैं टीप । वाह आजे इस आईडिया का पेटेंट ...अरे नहीं पीटेंट कराते हैं ..व्हाट एन आईडिया सर जी ॥

अभिषेक बाबू के ओझा उवाच पर आलसी जी उवाचे हैं :-

गिरिजेश राव उवाच

बड़ा लेट कर दिए छापने में। डर पर काबू पाने में समय लगता है। अच्छा किए यहाँ के स्थायी निवासी ब्लॉगरों का नाम नहीं दिए नहीं तो उनका तो ....:)
भाई, स्थिति इतनी खराब भी नहीं है। काहें हमरे ऊपी को ..? अब देखिए द्विवेदी जी भी वही बात कर रहे हैं। ऊपी लीडर है बाकी फॉलोवर।
सर्वजन जी से जब मुलाकात होगी, बताएँगे।

तमाम योजनाओं के गलियारों में वह बिला गए हैं। शोर इतना है कि उनकी पुकार भी नहीं सुनाई पड़ रही, कैसे उन तक पहुँचूँ?
January 19, 2010 9:00 AM

हमार टिप्पा : - का हो आलस भाई , ओझाजी का पोस्ट हो तो ऊ पर तो आपका लंठई देखते ही बनता है । उपी लीडर है , सचे कह रहे हैं का । आप कह रहे हैं तो मानना तो पडेगा ही मुदा सुने हैं कि लीडर जो है न उपी का उ सब एक ठो इटलानी (माने इटली की जनानी ) के आगे ....अरे नहीं नही उनके तिआग के आगे फ़ेल है जी । आ पूरा देश ...ई दधिचाईन ( दधिचि के बाद एतना बडा त्याग अब जाके किया है कोई ) के आगे ...जय हो हो गया है ...जय हो ।

अवधिया जी के देश में फ़रमाईन हैं :-

dhiru singh {धीरू सिंह}, January 19, 2010 3:46 PM

हम तो खुश थे पीछा छूट गया था पढाई से लेकिन यहां भी . ठीक ही है हिन्दी मे ब्लोगिग करने से पहले रिविजन हो जाये तो अच्छा है

हमार टिप्पा :-अच्छा अच्छा इहां रिवीजन और क्लास टेस्ट लिया /दिया जा रहा है । अवधिया जी का ट्युसनिया क्लास तो सब बचवा ब्लोग्गर सब को ज्वाईन अरे नहीं नहीं एडमिशन ..अरे धत तेरे कि उ का कहते हैं जी प्रवेश लेना न पडेगा । ओईसे सुने हैं कि जल्दीए ई पर घोर आपत्ति जताई जाएगी कि ब्लोग्गर बाबा पर आप लोग अईसे हिंदी का मुहिम नहीं छेड सकते हैं काहे से कुछ लोग हैं इंग्रेजी प्रेम वाले अभी भी । अरे इंग्रेज नहीं है ............मुदा पता नहीं ...हिंदुस्तानी भी नहीं हैं ......जी कसम से ....गौड प्रामिस ...


मन का पाखी में :-

HARI SHARMA said...

आपके इस लघु उपन्यास से एक बात तो जेहन मे साफ़ हो गई है कि अगर कोई लडकी प्रकट मे बेरूखी दिखा रही हो तो ये नही समझना चाहिये कि वो वास्तब मे आपको पसन्द नही करती है और नेह की बारिश से अन्गारो की गरमी भी निकल जाती है.

हमारा टिप्पा :- का हरि भाई , इत्ता सीरीयसली ले लिए । ई तो आप एकदम हरि भाई, अरे अपने संजीव कुमार जी जैसे संजीदा टाईप हो गए जी । नेह की बारिश .........अंगारों की गर्मी .......सबै ..वेलन्टाईन डे का असर है जी । हम जानिए रहे थे कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण ,...ऊ का साईड इफ़्फ़ेक्ट ...इ वेलेन्टाईन डे पर भी पडबे करेगा । हरि बाबू तनिक ई लघु वर्जन को और विस्तार दिया जाए जी । हम चाहेंगे कि बारिश ....अरे उहे नेह की बारिश के बाद ....और फ़िर अंगार की गर्मी हो कि भंगार की गर्मी ..........का सचित्र वर्णन किया जाए ।

बिल्लन के खेल खुल्लम खुल्ला में :-

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मुरारी बाबू! लगता है हेबीचुअल ओफेंडर हो गए हैं। दस नंबरी घोषित न हो जाएँ।

हमार टिप्पा :- हा हा हा ,,,,अरे सर ई मुररिया तो इहां का परमानेंट दस नंबरी .....अरे द्से काहे ..पता नहीं केतना नंबरी है ...पच्चीस पचास का दंड तो उ बेचारा को ...स्माईली भी लगा दे तो डा झटका ...जोर का झटका लगा देते है उ को । हम तो ऊ बचवा को सजेस्ट किये थे कि ....ए मकरंद ......तुम्हारा परफ़ार्मेंस जब कंसिस्टेंटली एतना बढिया है तो .....मकरंद की जहग अपना नाक ........मकदंड काहे नहीं धर लेते हो जी । आगे तो उ डाक्टरवा जाने कि ताऊ की बिल्लनियां ..॥
ललित शर्मा जी के ब्लोग पर अईसन टीपे हैं

पी.सी.गोदियाल, १९ जनवरी २०१० १०:३६ AM

बात तो बहुत उम्दा कही आपने कहानी के माध्यम से,
लेकिन एक गुस्ताखी करना चाहता हूँ ! क्या आप और मैं ऐसा कर सकते है ?मान लीजिये कि आज ड्राई डे है और ठण्ड की वजह से आपकी बड़ी इच्छा हो रही है कि..... आपके पास आज शाम को बो... में बस गिलास में डालने के लिए एक ही दफे का मौजूद है ! आप सुरु करना ही चाहते थे कि मैं पहुँच गया! तो क्या आप फोर्मलटी के लिए पूछोगे कि गोदियाल जी , आप लेंगे ? अगर यही सवाल आप मुझसे पूछोगे तो मैं कहूंगा कि बिलकुल नहीं मैं तो लिलास घताक्कर पूछता कि और ललित जी , कैसे आना हुआ ? हा-हा-हा-हा-हा ............कलयुगी साधू :)


हमार टिप्पा :- आज ड्राई डे है ...मान लीजीये ...अरे काहे मान लें । ई सरकार के कहने से माना जाता है का ई सब , हां ठंड की वजह से आपकी इच्छा हो रही है ........कि बो में बस ..........आयं बो में बस ..........ई कौन है बस है गोदियाल जी जिसमें खाली एकेठो सवारी चढ सकता है जी । अरे मान भी लिया ...मानेंगे कैसे नहीं ..अभी ऊपर माने हैं कि नहीं ...तो कह रहे थे कि मान भी लिया कि एकेठो सवारी चढ सकता है ..तो कंडक्टर को लटकने से तो आप नहींये रोक सकते हैं न । और गिलास गटक जाने के बाद पूछते आप .......आपको का लगता है शर्मा जी तब तक इंतजार करते ...तब तक तो खींच मारते ...........और आप ज्यादा नाराज़ होते तो ....आपको एक लिंक पकडा देते .....हम चर्चाकार लोगों को लिंक का ही ध्यान रहता है न हमेशा ॥


खुशदीप जी के देशनामा पर :-

'अदा' said...

छिछोर्दीप जी,
आपकी छिछोरी पोस्ट का हम अपनी छिछोरी टिपण्णी से छिछोरा जवाब न्यूटन के तीसरे छिछोरे नियम से छिछोरे तरीके से छिछोर कर दिए और आपसे इतना भी नहीं हुआ कि इस छिछोरी टिपण्णी का एक छिछोरी ही बात कह कर हमको अपनी छिछोरियत से परिचित करवाते...कैसे छिछोरे है आप ? छिछोरियत में भी छूट गए आप....छि छि...:):)
January 19, 2010 7:12 PM

हमार टिप्पा :- हम तो पहिले ही शाहिदवा को कहे थे कि रे छौडा....ई जो तुम स को फ़ कह कह के सारा शब्दावली बिगाड दिया है न देखना ई का प्रभाव अभी पडे न पडे .....सूर्य ग्रहण के बाद जरूर पडेगा ...। देखो हुआ न ....एक तो छुशदीप भाई ने ....एक ठो कमाल की छिछोरी छोस्ट लगाई और ढेरों टीपें पाई । बेचारा न्यूटनवा को का पता था कि ब्लोग्गिंग में ऊ का नियम का एतना घातक टाईप व्याख्या होगा । ई खबरची सब जो न करे जी । ऊपर से बकिया कसर अदा जी निकाल दी हैं । जय हो छिछोरापन हिट है सुपर हिट ....


तो अब जाएं जी ....

बुधवार, 13 जनवरी 2010

आपकी टिप्पी पर हमारा टिप्पा (टिप्पणी तडका )

जब हमने ये टिप्पी पे टिप्पा धरने वाला ब्लोग शुरू किया था तब मन में बस एक ही विचार था कि लोग जब यहां अपनी टीपों को टीप कर चल देते हैं तो फ़िर वो उस पोस्ट के साथ ही सिमट जाती हैं । सो सोचा कि पोस्टों की चर्चा,पोस्टों की बातें तो खूब होती हैं ,मगर टिप्पणि्यों का क्या, और फ़िर ऐसा तो नहीं कि उन टीपों को सजा के कोई गुलदस्ता न बनाया जा सके । तो बस गुलदस्ता सजाने के बाद ऊपर से गुलाब जल छिडक दिया है ॥आप मजा लीजीए

खुशदीप जी के ब्लोग पर

'अदा' said...

बॉलीवुड के सलमान खान और ब्लागवुड के महफूज़ अली में समानताएं....
१. दोनों नकचढ़े हैं..
२. दोनों अविवाहित हैं
३. दोनों की गर्ल फ्रेंड्स भाग जातीं हैं..
४. दोनों के डोले-शोले हैं..
५. दोनों बडबोले हैं...
६. दोनों दिल के बहुत अच्छे हैं..
७. दोनों लड़कियों से डरते हैं लेकिन दिखाते हैं की लडकियां उनसे डरतीं हैं
८. दोनों अपने-अपने में बड़े हैं
९. दोनों अपने-अपने घरों के आधार हैं....और घरवालों के लिए जान देते हैं..
१०. दोनों बेवकूफ हैं...
१२.दोनों की शक्ल भी थोड़ी मिलती है एक-दूसरे से
१३. दोनों घमंडी है
१४. दोनों जब भी मौका मिले बाडी दिखाते हैं..
१५. एक लेखक है दूसरा पेंटर यानी कलाकार हैं..

January 12, 2010 1:24 AM

हमारा टिप्पा :- लीजीए , अदा जी , एक तो पहिले ही महफ़ूज़ मियां , खुल्लम खुल्ला सांड हुए जाते हैं । कह रहे हैं हम तो अईसे ही झूम झूम के खेत सब चरेंगे ,दूसरा का उनको लाल कपडा दिखाएगा, उ तो खुदे लाल लंगोट बांध के दौड रहे हैं । अब उनको ई सलमान, आमिर , और शाहरूख बनाना छोडिए , और उनकी महफ़ूजनी का जुगाड कीजीये, बाराती तो ब्लोग्गर् सब जाएंगे ही , आखिर पता तो चले कि ब्लोग्गर को दामाद बनाने वाले को क्या क्या झेलना पडता है । फ़िर तो कह्ते फ़िरेंगे …..अरे यार कोई तो रोक लो ॥

हमारे अपने ब्लोग पर

बी एस पाबला ने कहा…

अभी देखा तो पाया कि खुद के द्वारा नियंत्रित हिन्दी, पंजाबी, अंगरेजी के 30 ब्लॉग हैं और करीब 4 अंग्रेजी की वेबसाईट्स। सभी विषय आधारित। किसी में कथित फूं-फां नहीं। साधारण सा लेखन ऐसा कि किसी को जानकारी जैसा कुछ प्राप्त हो। कोई मौज़ नहीं, कोई मस्ती नहीं। हाँ नियमित नहीं है लेखन्। इतनी फुरसत ही कहाँ है भई!
वैसे आपकी पोस्ट सारगर्भित

हमारा टिप्पा :- हा हा हा , सर जी हम सभी को जिन्न थोडी कह देते हैं यूं ही । ई तो वही जान सकता है जो आपके लंबे छोटे हाथों का कमाल देख रखा है । सब के सब विषय आधारित , बाप रे बाप । का सर केतना सब्जेक्ट पढ लिए हैं आप । छपास, बधाई, विज्ञान, अपनी बात, कमाई ,और पता नहीं क्या क्या ।हम तो सोच रहे हैं कि आपही के साथ एक ज्वाईंट अकाऊंट खुलवा लेंगे , ब्लोग से जब भी कोई कमाई होगी बिना एफ़डी कराए डबल हो जाईगी ॥

डागदर बाबू (डा. अमर जी ) के ब्लोग पर

अजय कुमार झा टिपियाइन कि

ल्यो , अथ डागदर बाबू कथा बार्ता प्रथमो अध्याय , स्टार्टम भवति । पहिले टेस्ट पोस्ट में कय ठो फ़ेल हो गईल हो डागदर बाबू हमरे तो लाग रहत बा कि जल्दीए सबके हुमोग्लोबिन आर डब्ल्यू बी सी , सबके टेस्ट होईये जाई । देखल जाय ई टेस्ट कय लोगन के टेस्ट (स्वाद बला हो ) बिगाड देत हय जी ॥
अजय कुमार झा

11 January 2010 10:46 PM

हमारा टिप्पा :- लो , अब अपने ही टीप पर टिप्पा, ए हो डागदर बाबू काहे लिए एतना घोटमघोट लिख कर सबको माथा पकडा देते हैं जी । हमको तो सब बूझा गया , काहे से कि हम आपके पुराने पेशेंट हैं ,मुदा और बहुते लोग आपका क्लीनिक अभी नहीं न ज्वाईन किया है । हां टेस्ट का रिजल्ट अगला पोस्ट में बताईएगा जरूर ….

रवीश जी के कस्बे पर

JC said...

जिस प्रकार मेरे बाबूजी अपने जीवन के अंतिम पडाव में मेरे साथ रहे '८५-'८६ में, तब वो टीवी के हर प्रोग्राम देखते थे - और देखने के बाद कहते थे "वाहियाद!"...वैसे ही भविष्यवाणी (मौसम की भी, समाचार पत्र/ टीवी में जैसे - जो अधिकतर गलत ही होती हैं) सुनने या पढने या देखने में हर कोई दिलचस्पी रखते हैं...यदि वो सत्य साबित हो जाये तो उनका विश्वाश अटूट हो जाता है किसी न किसी विधा पर, भले उसका कुछ भी नाम रहा हो, 'हस्तरेखा विज्ञान', 'अस्त्रोलोजी' या 'शस्त्रोलोजी' आदि, आदि...उस विश्वास को बनाये रखने के लिए कृष्ण के मामा कंस द्वारा सुनी गयी भविष्यवाणी की कहानी एक बड़ा रोल अदा करती है...
दिल्ली में अंग्रेजी का 'लिंटेल' मिस्त्री लोग 'लंटर' उच्चारते हैं...एक कहावत है, "जो घोष लिखता है / उसे बोस सही समझता है."...

हमारा टिप्पा :- एक दम धांसू टाईप टीपे हैं जे सी साहब । और ऊ का कहते है, ई रेट्रो टाईप याद सब , कमाल है था उ दिन सब , हम तो सोचते हैं कि जितना आनंद हम लोग को अपने बाबूजी के साथ आया करता था , ओतना हमरे बच्चा सबको अपने बाबूजी , नहीं नहीं पापा के साथ कहां आ रहा है ????

गोदियाल जी के अंधड पे

ललित शर्मा said...

बहुत ही चिंतनीय विषय है। चारों तरफ़ मंहगाई का तांडव हो रहा है, सरकार उदासीन हैं, चारों तरफ़ लुट मची है, निम्न मध्यम वर्ग पिस रहा है दो पाटों के बीच लेकिन ये प्रजातंत्र है आज नही तो कल जवाब देना ही पडेगा।
कभी हंसता हुआ मधुमास भी तुम देखोगे।
कभी समंदर सी प्यास भी तुम देखोगे
कलमुही सत्ता के मद मे ना झुमो इतना
कल जनता का दिया बनवास भी तुम देखोगे

January 12, 2010 4:05 AM

हमार टिप्पा :- ललित जी आपकी टिप्पी पर टिप्पा लगाना भाई हमरे बस का नहीं है जी , एक तो एतना गंभीर गंभीर बात ऊपर से कविता दोहे भी । माने रसगुल्ला के ऊपर मलाई लपेट दिए हैं । गोदियाल जी का पोस्ट हो और उस पर आपका टीप हो तो छटा देखते ही बनता है जी ॥

बाबा लंगोटानंद को ठंड का उपाय बताते हुए

महेन्द्र मिश्र said...

बाबा लंगोटा नन्द के लंगोट में हीटर फिट कराया जाए ......

13 January 2010 03:02

हमार टिप्पा :-हा हा हा , महेन्द्र भाई , ई तो बाबा जी को आप व्हाट एन आइडिया टाईप आइडिया दे डाले । हीटर का जो जगह आप बताए हैं , ऊ का व्यबस्था यदि सच में किसी ने कर दिया तो बाबा के अंदर जो ग्लोबल वार्मिंग होगी उ से तो हिमालय तो हिमालय हमको तो लगता है पूरा ब्रह्मांड ही पानी पानी हो जाएगा ॥

हमने खबरों की खबर ली तो वकील साहब बोले

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

भाई, आप तो पक्के टिप्पणीबाज हैं।

हमारा टिप्पा :-क्या सर , ई आपको अब पता चला , इहां इहे क्वालिटि /डिसक्वालिटी पर अपना दो दो ठो आउटलेट चल रहा है । एक तो इहे है और दूसरा उहे जिस पर आप ई टीपे हैं । हां बाज का तो पता नहीं टिप्पणी काग जरूरे है । दिन भर कांव कांव करते हैं और फ़िर भी मन नहीं भरता है …कांव कांव मतबल टीप जी ….

ताऊ जी के ब्लोग पर

Ratan Singh Shekhawat

Wednesday, January 13, 2010 9:01:00 AM

१. क्या हमको पलायन करना चाहिये?
इस देश की वीर भूमि राजस्थान में पैदा हुए है ताऊ श्री ! पलायन शब्द तो शब्दकोष में भी नहीं है | रणछोड़ दास कैसे बन जाएँ | इसलिए यह प्रश्न तो सिरे से ही नकार दीजिए |
धीर गंभीर लोग तो चाहते है कि किसी भी हथकंडे से ये मुस्कान देवी के पुजारी पलायन करले और वे एक छत्र राज्य करते रहें यदि पलायन करते है तो समझिये उनका मनोरथ पूरा हो गया इसलिए जमे रहें लोगों को हंसाते व खुद हँसते हुए मस्त रहे | पूरा ब्लॉगजगत जनता है कि लोग किसको ज्यादा पसंद करते है ?
२. क्या हमे इधर उधर से मार कर ब्लडी, ईडियट, साला, ससुरा, शराब, सिगरेट जैसे शब्दों को डालकर गंभीर लेखन करने का नाटक करना चाहिये?
ये शब्द उन्ही को मुबारक हो | हमारी संस्कृति में इन शब्दों के लिए जगह नहीं है | यदि यही गंभीर लेखन का पैमाना है तो लानत है ऐसे गंभीर लेखन पर और एसा लिखने वालों की संस्कृति पर |
३. क्या हमे एक ठिल्लूआ क्लब की स्थापना करनी चाहिये? जिससे गंभीरता को अलसेट लगाई जा सके?
हाँ ! ये बात हमें भी जम रही है | यह क्लब जरुर बनना चाहिए और ठिल्लुआ लेखन खूब ठेलना चाहिए ताकि उन गम्भिरियों को भी पता लगे लोग क्यापढना पसंद करते है ठिल्लुआ या गंभीर |
आप तो रामप्यारी ,हिरामन ,चम्पाकली ,झंडू सियार आदि के साथ खूंटे पर जमे रहे |
इन चरित्रों और खूंटे की बढती लोकप्रियता से जो लोग जलकर तीर चला रहे है उनका और दिल जलाने से मुस्कान देवी की सच्ची आराधना होगी |

हमार टिप्पा :- अरे रतन भाई , एतना लंबा टीप के बाद कसम है ताऊ को जो पलायन उलायन वाला बात बोले तो । अरे हम तो कह दिए हैं उनको कि ई गंभीर और चतुर रामलिंगम टाईप थ्योरी पर सोचने लगे हैं आज भी रामप्यारी अपने पहली पर जेतना टीप ले उडती है ,ओतना तो केतना को पूरा साल में भी नसीब नहीं होता है । है किसी में हिम्मत तो बिल्लन के रिकार्ड को तोडना तो दूर छू कर भी दिखाए ॥हां , नहीं तो …

सांड जी के ब्लोग पर

Yashwant Mehta, January 13, 2010 12:40 AM

वाह वाह
आज सांड महाराज का मूड बड़ा अच्छा लगता हैं. बड़ी गंभीर बात कह दी. बिलकुल सही, यह बाहर की दुनिया में कम गलियां सुनते हैं जो अब यहाँ पर भी सुने. ब्लॉग जगत में प्रेम का गीत गाते हुए आईये भाईचारे के साथ एक दुसरे की रचनाओ को चरते चले. आपकी रचना चर ली हैं और डकार भी मार ली. आईये हमारे ब्लॉग पर और चर डालिए सारीरचनाये

हमार टिप्पा :- आ हा हा , महाराज नंदी फ़्रैंड सांड जी के ब्लोग पर पहुंच कर उनका आशीर्वचनों का प्रसाद के बाद यशवंत भाई एतना प्रम पूर्वक, श्रद्धा से उनको दावत के लिए आमंत्रित किए हैं कि बस मन हरिया गया है ॥ सांड जी को भी हैप्पी ब्लाग्गिंग ,बस अब तो मेनका जी रह गई हैं , बकिया पूरा फ़ौज् तो ब्लोगियाईए रहा है जी

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

टीप पे टिप्पा : टैण टैणेण......

लीजीए जी , सबका आदेश मान के हमने ब्लोग का नाम भी नया रख दिया है और बिहारी बाबू का साथ देने एक ठो झारखंडी बाबा टिपौती लाल जी भी आ गए हैं .............उ भी अपना हाथ आजमाएंगे समय समय पर....तो झेलिए ...

मिश्रा जी के ब्लोग पर आज कमेंट की खुराक भरपूर मिली


बवाल कहते हैं :-
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

पंडितजी हम तो अलिफ़ बे पे ते टे से, जीम चे हे ख़े, दाल डाल ज़ाल से आगे बढ़ ही चले थे कि अचानक जीम ने ज़ाल को रोक लिया और कहा यहाँ मुझे आने देगा तो शायद पहली लाइन का जवाब सूझ जाए। हमने कहा जीम भी तो अपनी जबलपुर ब्रिगेड का हिस्सा है चलो इसका काम आसान कर दें। सो उसे उठाकर ज़ाल की जगह पहुँचा दिया। इससे हमें पहला हिंट मिला "जाल"।
हमने देखा कि पहली लाइन में "जाल" का रिलेटिव कौन है ? ज़ाहिर है व्याध।
अब शब्दार्थ आपको मालूम न हो ये तो हम कह ही नहीं सकते। और दोनों लाइनों का भावार्थ बताने के चक्कर में अच्छे खाँ, तुर्रम खाँ और फ़न्ने खाँ भी व्याध के इस सुनहरे जाल में इस तरह फ़ँसने वाले हैं कि फिर तो रिहाई ह्ज़ार ज़मानतों में भी मुश्किल होगी। हा हा ।
दिनकर विशेषज्ञों को जंजाल से सावधान करना फ़र्ज़े-बवाल था। कहाँ तक निभा पाए यह तो आगे पता चल ही जाएगा। आप बता ही चुके हैं कि यह तेज़ाबी परीक्षा है। और हम भी समझ चुके हैं के ये तेज़ाबी और सिर्फ़ तेज़ाबी परीक्षा है। हा हा।

पंडितजी आज आपको दिल से नमन है। बहुत गहरी बात है इस पोस्ट में।
4 January 2010 10:10


हमारा टिप्पा:- का बवाल जी, ई कईसन बवाल पे बवाल है भाई, आपका आन्सरवा पढ के तो लगा कि यार इससे आसान तो मिश्रा जी का प्रश्न ही था । आऊर आप दोनों जन मिल के केतना भारी भरकम मैसेज भेज दिए हैं देखिए तो भला । माने कि खाली ऊ पापी नहीं है जौन जौन चिकेन खाईस है , उहो ओतने पापी है जौन पौल्ट्री फ़ार्म खोले हैं जी तो कथा सार संग्रह ये कि ई हम लोग ब्लोगिंग ,हिंदी ब्लोग्गिंग के नाम पर जो मथ कुटौव्वल कर रहे हैं , उ सब ई गूगल बाबा की गलती है । एतना स्पेस दे दिए फ़्री में उठा पटक के लिए ...तो हे गुणी जनों समय लिखेगा गुगुलवा का अपराध ॥
लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अब विद्वान तो हम में से कोइ ऐसा नहीं जो पूर्ण ज्ञान का दावा करे :)
परंतु,
कुछ यही आशय है कि,
जैसा महिलाओं को प्रताडीत अवस्था में
समझाया जाता है कि,
' एक अपराध सह लेना मूर्खता होगी,
परंतु, उसके बाद,
अगर प्रताड़ना सहती रहोगी
वह कुछ अंश तक,
तुम्हारा अपना भी अपराध होगा '--

अब ये अलग बात है कि,
"प्रताड़ना " - स्त्री या पुरुष -
दोनों ही सहते हैं
चूंकि, ये विश्व,
कभी एक खेमे में ,
रुका नहीं
-- वाद विवाद - अंतहीन हैं ---

आशा है, हमारे ब्लॉग जगत में ,
शांति बनी रहे --
- संयम, सद`भावना, सौहार्द्र ,
मित्रता कायम रहे --
अन्यथा
" न जाने नया साल क्या गुल खिलाये " -- ये सच हो जाए !!
आपके समस्त परिवार के लिए आगामी नव वर्ष २०१० सुख शांति व समृध्धि लेकर आये इस शुभकामना सहीत

सद्भाव सहीत,
- लावण्या

हमार टिप्पा :- ई को कहते हैं एक तीर से पता नहीं केतना शिकार । का लावण्या जी , हम होते न तो एतना माल मसाला में तो तीन ठो टीप उडाए होते ,एक आप हैं देखिए तो भला ।प्रश्न का जवाब भी दे दीं, स्त्री पुरुष का गहन चिंतन भी हो गया और चलते चलते शुभकामना भी टिका दिया । ऐके लाईन का अर्थ पूछे तो एतना सब ठेल दी आप जो मिश्रा जी कहीं पूरा व्याख्या करने को कह देते तो...........हमें पूरा यकीन है कि एक सुंदर सी टीप एकदम पोस्ट जैसी फ़ीलींग वाली पढने को मिल जाती ॥

गिरिजेश राव said...

हमें अपनी एक पुरानी कविता का अंश याद आ गया। एक शिव बाबू उसमें भी हैं - व्याध व्याध में फरक होत है। जब तक हम कविता की कुंजी ढूढ़ें, आप लोग मनन करें। पूरी कविता यहाँ है: http://kavita-vihangam.blogspot.com/2009/11/2.html।
"
अचानक शुरू हुई डोमगाउज
माँ बहन बेटी सब दिए समेट
जीभ के पत्ते गाली लपेट
विवाद की पकौड़ी
तल रही नंगी हो
चौराहे पर चौकड़ी।
रोज की रपट
शिव बाबू की डपट
से बन्द है होती
लेकिन ये नाली उफननी
बन्द क्यों नहीं होती?
"
हमारा टिप्पा :- आप एकदमे ठीक नाम रखे हैं आलसी , बताईयो तो भला इहां केतना गंभीर प्रश्नोत्तर राऊंड चल रहा है और आपको कविता याद आ गया, और ऊपर से लंठई भी प्रमाणित कर दिए ठेलिए दिए न आप , ऊ भी लिंक समेत । बच गए आप जो अभी गूगल बाबा ने पेमेंट चालू कर दिया होता तो , भारी जुर्माना लगता आप पर , कि मिश्रा जी के प्लौट पर बहाने से आप अपना एक ठो कोठरिया आप डाल दिए । एतना आलस , राम राम , मजा आ गया , सबको थोडा थोडा ई आलस प्रेषित कीजीये न ॥

अलबेला जी के ब्लोग पर

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर January 4, 2010 9:18 PM

ये तो भारत रत्न जैसा, पद्म अवार्ड जैसा विवाद हो गया, हम तो बिना बात के ही आप सभी की निगाह में आ गए. पिछले डेढ़ साल से लिख-लिख कर प्रयास में थे कि कैसे भी सफल हो जाएँ, अब ई-मेल बना बना कर थके जा रहे हैं कि कैसे भी १०० मतों का जुगाड़ हो जाए. उफ़ आज तो थक गए अभी तक २०-२५ ही बन सकीं हैं............
आखिर विवाद क्यों? कब तक देश में समिति, आयोग बनते रहेंगे? कब तक लोगों की वरिष्ठता का रोना रोया जाता रहेगा?
चलिए अब बस ई-मेल भी बनानी है, जीतना जो है....

हमार टिप्पा :- का डा साहब , एतने में थक गए, अभी तो हमको आपका मेल मिला भी नहीं है । ओईसे आप एकदम बेफ़िक्र रहिए ई से पहले भी हम बहुत लोगन को अपना मत से केतना पुरस्कार जितवाए हैं , लेकिन अबकी मुश्किल लग रहा है काहे से कि ई ब्लोगगर नगरिया न है । इहां के दस्तूर निराले हैं । ओईसे अलबेला जी बहुते ठोके मांजे आमदी हैं न , इसलिए ई बार कौनो जासूसी,कौनो चालाकी चलेगा नहीं । हम तो सोच रहे हैं कि हमरा नाम नहीं है , बढिया हुआ खामख्वाह एतना दिन टेंशन में रहते कि ...पच्चीस हज़ार मिलने के टेंशन में लिखिए पढिए नहीं पाते ....ब्लोग खोलते ही खाली नोटवा सब दिखता न ॥


अदा जी के पोस्ट पर :-
बवाल said...

बाप रे अदा जी,
घर वर की सुन्दरता तो खै़र ठीक है ये पाबला जी से तो अब दहशत टाइप की हो रही है।
अरे सरदार जी ने कहीं लोगों के बाथवाथ रूम के सीन वीन न ले लिए हों। बाद में कालापत्र सॉरी ब्लॅकमेल करने के लिए। दोस्तों सावधान। अच्छा हुआ अदाजी आपने बतला दिया। खिड़की में परदा क्या हम तो अब अपारदर्शी बुरका डाल कर नहाने की योजना बना रहे हैं। हा हा।


हमारा टिप्पा :- जे बात , बवाल भाई अब बवाल मचाने से कोई फ़ायदा नहीं ,अब तो फ़ोटो खिंच ली और इसी खुफ़िया रिपोर्टिंग विथ फ़ोटोग्राफ़ी में भेद खुला है कि आजकल ब्लोग पर जो बाबा लोग अपनी अपनी लंगोटी ढूंढने में लगे हैं वो सब आपही ने उडाई हैं । अरे हमको तो पता चला है कि उसी कैमरा से ई सब फ़ोटो भी खींचा गया है कि कौन कौन लोग/लोगिन अनाम टाईप बन के सबको खूबे गरियाए हैं जी । देखिए न का का होता है , ई तो खाली ट्रेलर है ........पिक्चर अभी बांकी है मेरे दोस्त ॥


खुशदीप जी के देशनामा पर डाक्टर साहब said

डा० अमर कुमार said...


खुशदीप लल्ला..
अपुन दास मलूका टाइप मानुष हैं, लल्लो-चप्पो नहीं करते ।
नववर्ष की पूर्व-सँध्या पर तुम्हारे द्वारा चित्रित तीन विसँगतियों ने तुम्हारे द्वारा चित्रित तीन विसँगतियों ने मुझे भी उतना ही उद्वेलित किया, जितना आप हुये होगे ।
मैं पोस्ट तैयार करने की सोच रहा था, और तुम्हारी यह पोस्ट पढ़ने को मिल गयी । सो.. लल्ला, हमनें लिखबे को का ज़रूरत ?
इसे कहते हैं, पॅरपज़फुल ब्लॉगिंग !
और आपने यहाँ मुझको लेकर एक मुहिम छेड़ दी ? ऎसा नहीं है..
टँकी-वँकी.. रूठ-तकरार.. मैं क्या जानूँ रे
जानूँ तो जानूँ बस ये कि अपना कुँआ जानूँ रे

आजकल अपने कुँयें, समझो कि डोमेन को कॅनफिगर कर रहा हूँ, फिर वहीं चैन से टर्रायेंगे ।
जानते ही हो कि, बुद्धिजीवी गोत्र में दिखने की मज़बूरी है, कि गाहे बगाहे, बात बेबात, बेमौसम टर्राना..
मुला अविनाश जी ने दिल खुश कर दिया, टर्र महाराज की टर्र हवा कर दी ।


हमार टिप्पा :- अब डा साहब के टीप पर का टिप्पाएं, मुदा सब ठो पोल तो डाग्दर बाबू अपने न खोल दिए , कहे हैं कि डोमेन कनफ़िगर करा रहे हैं , कराईये सर कराईये । हम तो जाने केतना टाईम से अपन वोमेन को कनफ़िगर करा रहे हैं कि काहे हमको एतना टोकरिया भर भर के गरियाती हो , तुमही काहे नहीं हमरे साथ भी ब्लोगियाती हो जी । मुदा ऊ कहां मानती हैं जी । डा. साहब आप कभी मलूका दास हैं तो कभी अपने बेंग बन जाते हैं , सब कुछे आपके अधिकार क्षेत्र में है । और हम तो कह रहे हैं भाई खुशदीप जी डा. साहेब ई मुहिम से नहीं मानेंगे ......एक ठो बडका टाईप आंदोलन चलाया जाए का कहते हैं ..????????

बिल्लन के खेल खुल्लम खुल्ला में

संगीता पुरी said...

नरेन्‍द्र मोदी ही हैं .. किसी को लिंक चाहिए क्‍या ?

हमार टिप्पा :- हां हां संगीता जी चाहिए नरेंद्र मोदी जी का लिंक किसको नहीं चाहिए । ओईसे तो लाल अडवाणी न कहेंगे काहे से ऊ तो कह रहे हैं कि धत हमरा तो लुटिया डुबा दिहिस । कुछ आतंकवदिया सब भी कह रहा था कि हमही को लिंक दे दो ,केतना दिन से ढूंढ रहे हैं उनको उडाने के लिए । हमको तो लिंक खाली ई लिए चाहिए कि सोच रहे हैं गुजरात में एक ठो दोकान शुरू करें ...लिट्टी विथ ढोकला कौंबो पैक वाली स्कीम से । उनका लिंक रहेगा तो दुकानदारी बढिया जमेगा । और कौन कौन नेता का लिंक है आपके पास । ज्योतिषी लोगन से सबका जान पहचान रहता है अईसा सुने थे हम भी ...आज पक्का हो गया ॥


हमरे अपने ही ब्लोग पर
cmpershad ने कहा…

गांव की यात्रा समाप्त... अब शहर की यात्रा शुरू... ब्लाग लेखन, ब्लागर मीट यही कुछ चलता रहेगा और हां दोहाकार चर्चा भी:)

इसका तो टिप्पा हम वहीं धर दिए रहे , देखा पढा जाए

प्रसाद जी कभी कभी पोस्ट के विषय में भी कुछ लिख दिया करें तो बच्चे का मार्गदर्शन हो जाएगा , अब क्या करें ब्लोग्गिंग में , प्रधान मंत्री बनना, या यमुना साफ़ करना, या कोपेनहेगन समझौता कर लेना, या कोई क्रिकेट मैच करवाने की फ़ैसिलिटी अभी शुरू नहीं हुई है , जैसे ही होगी , ये सब छोड के उन पर ध्यान दिया जाएगा



मुखिया जी कस्बा में फ़रमाते हैं :-

रविश भाई - मन खुश हो गया - आपका लेख पढ़ कर ! "सड़क-छाप" या "सड़क-निर्माण" मुख्यमंत्री ने कुछ किया है ! पर वो कर बहुत कुछ सकते थे ! जिस अखबार समूह ने इस तरक्की की खबर जिस तरक्की से बता रहा है - जरा गौर फरमाए ! काफी दिनों से इस अखबार समूह के सभी संस्करण में "सड़क-निर्माण" की निविदाएँ छाप रही हैं - ५-६ पेज में ! जैसे ..पिपरा - कोठी के किसी गाँव के सड़क निर्माण का टेंडर - इस अखबार समूह के बंगलोर और मुंबई इत्यादी संस्करण में ढेर सारे " टेंडर" आये ! सड़क निर्माण मुख्यमंत्री को लगा होगा की मुंबई के ठेकेदार शायद मुखिया जी के गाँव का सड़क बनवा दें ! खैर... अब अखबार समूह का भी कर्तव्य बनता है - कुछ छापने का - खबर के रूप में ! वैसे एक बार आप ने सही कहा था की - नितीश जी "सड़क निर्माण" मुख्यमंत्री हैं ! वो बात बिलकुल सच्ची लगी ! विशेष ..तो इस वर्ष चुनाव भी है ! हो सकता है ...नितीश खुद कई ..."तिवारी" - "पाण्डेय" - "सिंह" को टिकट मिल जाए !
January 5, 2010 3:14 PM

हमार टिप्पा :- आयं , मुखिया जी , पहिले तो ई बताईये कि गोया ई प्रशंसा था कि खाली प्रशंसा के पैकिंग वाला सस्पेंशन और्डर था । सडक वाले सी एम , कमाल का एंगल है जी ई पर तो एक ठो बढिया सिनेमा बन सकता है .....बस आमिर खान बनाएं तो हिट होईये जाएगा । सब कुछे सडक पे, सडक पे विकास, सडक पे खेती, सडक पे मकान दुकान , अस्पताल, इस्कूल, सब कुछ सडक पे , फ़िर हम देश से अलग होने के लिए सडकांचल की मांग उठाएंगे ॥

डा अनुराग प्रशांत की छोटी सी दुनिया में बोले हैं जी :-
याद करने की कोशिश करता हूं पर याद नहीं आता .कुछ दिन पहले फार्मा इंडस्ट्री वाले कई सारे ग्रीटिंग लेकर आये थे बोले "सर "नए साल में किसी को भेजने हो ...मैंने कहा नहीं भाई .एस एम् एस की बेगारी बहुत है....अब तो लगता गई इश्क का इज़हार भी लिखे से नहीं होता होगा....

हमारा टिप्पा :-का डा. साहब , आजकल तो लोग इश्क का इजहार करने के लिए लिखते पढते कहां हैं हां सुना है कि ससुरे डायरेक्ट ही सनीमा ले जाते हैं और इंटरवल आते आते बोल डालते हैं बिंदास............आती क्या खंडाला। हां तो ठीक, वर्ना शहर में क्या सनीमा हाल की कमी है , मौर्निंग शो में न सही मैटिनी में ही सही, और ये वाली न सही वो वाली ही सही ॥





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