शनिवार, 5 मई 2012

किसने , कहां , किसको , क्या कहा ….टिप्पणी चर्चा

 

 

 

कहा सुना जा रहा है कि इन दिनों ब्लॉगिंग में न सिर्फ़ पोस्ट लिखने की बल्कि , पढने की और जाहिर है कि पोस्ट पर टिप्पणियों की रफ़्तार भी बेहद कम होती जा रही है , हमने पडताल की , कि क्या सचमुच ही ऐसा हो रहा है , लेकिन नहीं जी । कौन कहता है , आइए दिखाते हैं आपको ,  हाथ कंगन को आरसी क्या ………

 

पूजा आजकल अपने ब्लॉग पर लहरों का तूफ़ान उठाए हैं , कमाल की बिंदास शैली और दिलचस्प विषय । इस पोस्ट पर उन्होंने , अपनी ताज़ा ताज़ा हेयरकट को विषय बनाते हुए जब लिखा तो देखिए क्या कहा सबने

GunjanMay 5, 2012 07:52 AM

हा हा आहा अरे पूजा गज़ब ढा रही हो यार ... कित्ती बार कहा है ऐसी पिक्चर पोस्ट न किया करो बाबु... दिल बैठ जाता है हमारा :PPP ..... दुनिया के सारे पति एक्से ही होते हैं बच्चा........ बस पत्नियाँ अलग-अलग... छोटे,लम्बे bob कट बालों वाली.... हम्म वीकेंड में जब इक ठौ गज्ज़ब का पोस्ट मिल जाये तब कौन कमबख्त उसे नज़रंदाज़ कर सकता है.. और उस पर तुम्हारा लिखा.... हाह्ह्ह्हह्ह अब कैसे लिख कर बतायें की कित्तनी लम्बी सांस भरी है हमने तुम्हारी इस पोस्टवा पर

हम कहां पीछे रहने वाले थे ...

  1. अजय कुमार झाMay 4, 2012 09:08 PM

    ई कटिंगवा तो ठीके है मुदा ई घेंट टेढा करके तरघुइयां लुक देके ई एक आखं देखाने वाला चलचित्तर कौन हिंचिस है जी । पोस्टवा त चौचक हईये है । ...फ़ेसबुक पर लईले जा रहे हैं । का कहे ..वीक एंड पर ...अजी वीक एंडवे पर जादे पढा जाता है ...ई इंडिया है बाबू ...आते हैं फ़िन से पलटी मार के

 

जब अवधिया जी ने पूछा

चैटिंग - एक सजा या मजा

 

तो जवाब आया

प्रवीण पाण्डेय said...

ब्लैक होल है, समय भी नहीं निकल पाता है यहाँ से।

 

जब रचना जी ने नारी ब्लॉग पर कहा कि

इस उड़ान को अब रोकना संभव नहीं हैं .
 

तो इस पर आई प्रतिक्रिया देखिए 

  • indianhomemaker

    सौदी अरब में भी ६० प्रतिशत से अधिक उच्च शिक्षा की छात्र महिलाएं ही हैं.
    और बंगलौर के कई कॉलेज में लडको के लिए कट ऑफ लड़कियों से कम हैं, क्योंकि लड़कियां हर साल ज्यादा अंक ला रही हैं, इससे बहुत सी कम आय वाले वर्गों की छात्राओं को शायद दाखिला न मिल पता हो, चाहे उन्होंने घर का काम करते करते, सड़क पर यौन शोषण झेलते झेलते लड़कों से अधिक अंक पाए हों.

     

    1. रचना

      कब तक कर सकेगे ? २ साल से टॉप पर आईएस मे लडकियां हैं . सिस्टम बदल देगे धीरे धीरे वो जैसे जी टीवी पर पतंग उडाती लडकिया आती हैं लिंक खोजती हूँ

  •  

     

    छत्तीसगढ के कलेक्टर जब नक्सलवादियों के चंगुल से छूटे तो प्रतिक्रिया ऐसी हुई

    ‘यार, ये एलेक्स तो बड़ा मतलबी निकला...!’

     

    देखिए कि इस पर पाठकों ने क्या कहा

     

  •  

  • रविकर फैजाबादी

    जान बची तो लाख उपाया, लौट कलेक्टर घर को आये |
    अहमद किशन बड़े अहमक थे, बिन मतलब के जान गँवाए |
    इलेक्स रिलेक्सिंग बंगले में अब, नक्सल बैठे घात लगाए -
    किसको फुरसत है साहब जी, मौत पे उनके अश्रु बहाए ||
    बेमतलब है नीति नियम सब, नीयत में ही खोट दिखाए |
    एक तरफ है ढोल नगाड़े, दूजी तरफ मर्सिया गाये |
    अहमद किशन शहीद हुए पर, सरकार पुन: छलनी कर जाए |
    उनके दो परिवार दुखी हैं, इन गदहों को कौन बताये ||

     

  • अरूण साथी

    अतुल जी मैं आपसे कतई सहमत नहीं, यह सच है कि शहीद जवानो के परिजनो ंकी संवेदना को समझना चाहिए पर इसके लिए एलेक्स मेनन का दोष कहां है। आप भी जानते है और मैं भी कि यह सब पटाखे बाजी मीडिया के लिए न्यूज बनाने वाले हम और आप ही होते है और मेनन को बात नहीं करना उनका सदमे में होना भी हो सकता है, इतनी जल्दी कोई कौसे मौत की आगोश से लौटने के बाद उबर सकता है..

  •  

    शुकुल जी एक ठो नयका उलझन का मनोविज्ञान पर थीसिस लिख डाले जैसे ही

     

  • देवांशु निगम

    देवांशु निगम

    ये बात तो एकदम सही है , घूस देने वाले के धर्म संकट के बारे में कोई सोचता ही नहीं :) :) :)

    आजकल तो ऑनलाइन टिकट बुक कराने पर कन्विनियेंस चार्ज लगता है , हिंदी में इसे ही सुविधा शुल्क कहते हैं | अब सब ओफिसिअल मामला हो गया है |

    घूस की महत्ता का वर्णन काका हाथरसी ने भी किया है :

    कूटनीत मंथन करी , प्राप्त हुआ ये ज्ञान |
    लोहे से लोहा कटे, यह सिद्धांत प्रमान |
    ये सिद्धांत प्रमान , ज़हर से ज़हर मारिये |
    काँटा लग जाये कांटे से ही निकालिए |
    कह काका कवि काप रहा क्यूँ रिश्वत लेकर |
    रिश्वत पकड़ी जाए छूट जा रिश्वत देकर |

    रिश्वत की महिमा अपरमपार है | :) :) :) :)

  •  

     

    लगता है पिछलका दिन बाल कटाई दिन था उधर पूजा अपना हेयर इश्टाईल पे लिख रही थी त इधर बिबेक बाबू , बोले तो विवेक रस्तोगी जी ..बाल कटवाने की कवायद ठेल रहे थे , इस पर मिसर जी टीपे

     
    1. शिवम् मिश्रा

      आप भी न फुटेज बहुत खाते है ... अब यह भी कोनो बात हुआ ... इतना बड़का कहानी सुना दिये ... और बाल कटवाने के बाद ... चाँद का मुखड़ा और मुखड़े का चाँद दो मे से कुच्छो नाही दिखाये ... धत ... फोटो साटिए यहाँ एकदम ताज़ा वाला ...

       

       

      1. Vivek Rastogi

        शिवम भाई फ़ोटो कल साट देंगे ।

      2. शिवम् मिश्रा

        साला पहले मालूम होता तो कमेन्ट ही न करते ... हद है भाई साहब ... यहाँ भी उधारी ... का होगा इस देश का ...

      3. Vivek Rastogi

        अरे अभी सोते सोते का फ़ोटू आता, इसलिये कल तक के लिये उधार ही सही

      4. शिवम् मिश्रा

        अरे फोटू कहाँ है भाई साहब ... जे भी कोई बात भइ का ... हद है भई

     

    आ मिसर जी लाईट लेके रस्तोगी जी का फ़ोटो तलास रहे हैं अब तकले

     

    प्रवीण पांडे जी  ने जैसे ही ..बिग बैंग के प्रश्न ….उछाले

     

     

  • udaya veer singh

    मेरे ज्ञानी मित्र ,निःसंदेह ईश्वर ने..... पृथू का प्रश्न नैशर्गिक है ,कुतूहल वस नहीं जिज्ञासा वस ,और पृथु की जिज्ञासा हमारी सफलता है .....अलबर्ट आइन्सटीन साहब का शिखर प्रयास अबतक का उच्चतम प्रयास रहा है ......अभी तक हम अपनी उत्पत्ति का उद्दगम तलाश रहे हैं जितना पाए हैं संतुष्टि के लिए सवांश है ....बिग बैंग की थ्योरी प्रमाणिकता के आधार पर ही ग्राह्य होगी ......हमारी साधना ,हमारा मानस किस अवस्था में है कहना जल्दबाजी होगी ....../आदि गुरु नानक देव जी ने अपनी पवित्र वाणी में फरमाया है---
    " पाताला पाताल लख,आगासा आगास....."
    पृथु का यक्ष प्रश्न अनुत्तरित नहीं होगा ऐसा विश्वास है........../ वैज्ञानिक व्यावहारिक उन्नत आलेख ......बहुत -२ शुभकामनायें आपकी लेखनी व आप दोनों को...

  •  

  • veerubhai

    विज्ञान का इस कहानी में विश्वास या अविश्वास उतना ही वैकल्पिक और काल्पनिक है जितना विभिन्न धर्मों द्वारा प्रस्तुत ईश्वर की अवधारणा में।
    (1)'विज्ञान का इस कहानी में विश्वास या अविश्वास उतना ही वैकल्पिक और काल्पनिक है जितना विभिन्न धर्मों द्वारा प्रस्तुत ईश्वर की अवधारणा में।'
    (3)पृथु पूछते हैं कि बिग बैंग किसने कराया, ईश्वर ने या विज्ञान ने?
    (2)यदि आपकी गति प्रकाश की गति के समकक्ष है तो आपका एक वर्ष कम गति से चलने वाले के कई वर्षों के बराबर हो सकता है, अर्थात कम गति से चलने वाला अधिक गति से बूढ़ा होगा।
    (1)एक के बारे में इतना ही बिग बेंग के पर्याप्त प्रमाण जुटाए जा चुके ,मसलन यह सृष्टि ३ केल्विन तापमान वाली दूधिया रोशनियों में नहाई हुई है .कोस्मिक बेक ग्राउंड रेडियेशन की मौजूदगी इसकी पुष्टि करती है .बिग बेंग विस्तार शील सृष्टि का समर्थन करता है प्रमाण अधिकाँश तारों की स्पेक्ट्रम पत्ती में रेखाओं का अधिक लाल होना है ,लाल की और खिसकाव है ,जिसे रेड शिफ्ट कहा जाता है .सृष्टि में व्यापक स्तर पर अन्धेरा है इसीस खिसकाव की वजह से दृश्य प्रकाश अदृश्य की और जा रहा है .
    (२)प्रकाश की गति इख्तियार करने वाले यात्री के लिए समय का प्रवाह रुक जाएगा .वह जवान बना रहेगा .पृथ्वी पर तब तक कई पीढियां गुज़र चुकीं होंगी .
    (३)बिग बेंग आवधिक घटना है स्वत :स्फूर्त .सृष्टि बनती है बिगडती है .ऊर्जा -द्रव्यमान ,मॉस -एनर्जी का द्वैत माया है एक तत्व की ही प्रधानता कहो इसे जड़ या चेतन .द्रव्यमान -ऊर्जा एक ही भौतिक राशि का नाम है अलबत्ता इसका परस्पर रूप बदलता रहता है .घनीभूत ऊर्जा द्रव्यमान यानी पदार्थ में तबदील हो जाती है विर्लिकृत ऊर्जा रूप में अदृश्य बनी रहती है .उसके प्रभाव ही दृष्टि गोचर होतें हैं .
    आपकी इस शानदार पोस्ट के लिए बधाई .चर्चा जारी है .कृपया यहाँ भी पधारें -
    शनिवार, 5 मई 2012
    चिकित्सा में विकल्प की आधारभूत आवश्यकता : भाग – १

  •  

     

  • कौशलेन्द्र

    सारा विज्ञान सापेक्षता के स्पर्श से आलोकित हो पा रहा है। सापेक्षता के परे भी कुछ होना चाहिये ...जो होना चाहिये वह सूक्ष्मतम की ओर संकेत करता है। सांख्य दर्शन से मार्गदर्शन मिल सकता है। फ़िलहाल यह स्वीकार करने में कोई हर्ज़ नहीं है कि "पूर्ण" से अपूर्ण की उत्पत्ति हुई है ..और अपूर्ण का अंतिम विलय "पूर्ण" में ही होता है। यह "पूर्ण" हमारे य़ूनीवर्स का वह सत्य है जो दिक, काल, ऊर्जा और पिण्ड का एकमात्र स्रोत है। पाण्डॆय जी! कई बार लगता हैकि विज्ञान के आंशिक सत्य से हम सम्मोहित हो गये हैं और पूर्ण सत्य के ज्ञान से वंचित हो रहे हैं। पृथु को सांख्य दर्शन के समीप ले जाने का प्रयास उसकी जिज्ञासा के समाधान का कारण हो सकता है।

  •  

    तो चलिए आज के लिए इतना ही ….अब तो आपको यकीन हो गया न कि …यहां पोस्ट ही नहीं बंधु , टिप्पणियां भी पढी जाती हैं

    शनिवार, 7 जनवरी 2012

    टिप्पणियों की टोकरी



    टिप्पणियों को प्रोत्साहित करें


    यथार्थ की इस पोस्ट पर :-

    राज भाटिय़ा ने कहा…
    गरीबी कोई इलजाम नही बल्कि कुछ लालची लोगो की देन हे, जो इन गरीबो का हक मार कर खुद को अमीर कहते हे...


    .
    1. ये ऐसा क़र्ज़ है जिसको अदा कर ही नहीं सकता,
      मैं जब तक घर न लौटूँ माँ मेरी सजदे में रहती है!!
      देव बाबा, अपने जश्न में हम भूल जाते हैं कि कोई हमारा इंतज़ार भी कर रहा है!!
    2. कई बार रातों में उठकर
      दूध गरम कर लाती होगी
      मुझे खिलाने की चिंता में
      खुद भूखी रह जाती होगी
      मेरी तकलीफों में अम्मा, सारी रात जागती होगी !
      बरसों मन्नत मांग गरीबों को, भोजन करवाती होंगी !

      सबसे सुंदर चेहरे वाली,
      घर में रौनक लाती होगी
      अन्नपूर्णा अपने घर की !
      सबको भोग लगाती होंगी
      दूध मलीदा खिला के मुझको,स्वयं तृप्त हो जाती होंगी !
      गोरे चेहरे वाली अम्मा ! रोज न्योछावर होती होंगी !
      सतीश सक्सेना जी की पोस्ट पर :-

      संतोष त्रिवेदी said...
      पूज्य पिताजी हेतु समर्पित अंतर के हैं भाव आपके'
      उनकी नसीहतें,उनकी चिंता,याद हमेशा आती हैं.

      उनकी निंदिया रोज़ चुराई ,उसकी क्या भरपाई होगी,
      उनके कामों को करके ही ,मुक्ति आपको पानी होगी !


      .....आपने अपने बहाने हर किसी को उसके पिता की याद दिला दी !



      लहरें की इस पोस्ट पर :-


      देवांशु निगम said...
      "वीर" ने एक दिन माँगा था "ज़ारा" से , ऐसा ही एक दिन माग लिया "छवि" ने "असित" से| मांग लिया तो मांग लिया,प्यार भी हो गया, प्रपोज़ भी किया , शादी भी हो गयी| और शादी को २५ साल भी |
      ये जो कहनियाँ दुबारा से वापस आती है, जहाँ पे पिछली बार रुकी थी वहाँ से (कुछ कुछ कोलाज की तरह), ये मुझे बहुत अच्छी लगती हैं | "लव आज कल" , "ऊट-पटांग" और "रॉकस्टार" इसीलिए मुझे बहुत पसंद है| अब ये कहानी भी मेरी पसंदीदा में शामिल हो गयी |

      फिर से प्यार करवा दिया... :) :) :)
      मृदुला जी की इस पोस्ट पर :-

      रेखा श्रीवास्तव said...
      कहाँ से चले थे और कहाँ पहुँच गए? अरे अपने तो सही ही कहा था उसके दूसरे हाथ में कलम जाते ही अर्थ बदल गए. क्या ऐसा
       ही होता है? नहीं तो हम सब एक जैसे ही होते हें. फिर भी दूसरी जबान से कुछ कहे जाते हें.


      Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...
      वाह मालिक... शादीलाल की दुकान याद दिला दी और वो ५ रूपये में एक घंटे का वीडियोगेम.. :)


      Rahul Singh ने कहा…
      on 
      मुझे ध्‍यान आता है कि छत्‍तीसगढ़ के जयदेव बघेल जी और सोनाबाई जी, दो ही शिल्‍पी हैं, जिन्‍हें शिल्‍प गुरु उपाधि मिली.
      बघेल जी की याददाश्‍त और किस्‍सों के बदौलत वह अपने इर्द-गिर्द ऐसा संसार रच देते हैं, जिसमें आप उनकी उंगली न पकड़े रहें तो भटक ही जाएं.
      (गड़वा, सामान्‍यतः घड़वा उच्‍चारित होता है.)




       मनोज जी की इस पोस्ट पर :-



      चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…
      मनोज भाई!
      आजकल आप "फुर्सत में" बच्चा लोग को घर पर छोडकर भागे रहते हैं... अब समझ में आया कि बच्चे जब बड़े हो जाएँ तो अपना यौवन लौट आता है.. अब देखिये न.. पार्क स्ट्रीट, कैमक स्ट्रीट, क्वींस मैन्शन सब घुमा दिए कल्ले-कल्ले.. तभी तो हो गयी है बल्ले-बल्ले और आप ऊ ला ला करते हुए मस्त हैं..
      नया साल में नया फलसफा लेकर आये हैं..मौत से किसकी रइश्तेदारी है/आज उसकी तओ कल हमारी बारी है.. मगर नीचे बैठने वाले से सावधान.. जरूरी नहीं कि वो इसलिए बैठा हो कि उसे और गिरने का डर नहीं.. बल्कि गौर से देखियेगा तो पता चलेगा कि उसकी निगाह सबसे ऊंची जगह पर है..! मज़ा तो तब है जब दुनिया के शिखर पर ऐसे बैठे मानो फुटपाथ पर बैठे हों!!!
      नया साल आपके जीवन में ऊ ला ला बरकरार रखे यही शुभाकामना है...!और आप फुर्सत में बने रहें यही आशा है!!



      संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…
      हम फुटपाथिए भी तो उन्हें छोटे ही नज़र आ रहे होंगे – हां देखने का नज़रिया होता है – दो तरह का --- दो तरह से चीज़ें देखने में छोटी नज़र आती हैं --- एक दूर से --- दूसरी गुरूर से!

      उ ला ला के साथ इतनी गहन बात ? फुर्सत में काफी कुछ सोचने की मिल जाता है .. साधू की बात सटीक है नीचे बैठने वाले को गिराने का अंदेशा नहीं रहता ..



      नीरज गोस्वामी ने कहा…
      वो बोलता है, --- बच्चा ! यह बात याद याद रखो। ... नीचे बैठने वाला कभी गिरता नहीं!

      वाह...क्या अद्भुत रचना है...लाजवाब. मुझे महान फिल्म मुगले आज़म का वो सीन याद आ गया जिसमें शेह्ज़दा सलीम "तेरी महफ़िल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे..." गीत /कव्वाली वाले मुकाबले में हारने वाली अनारकली को गुलाब के फूल के बजाय उसके कांटे उपहार में देता है जिसे लेकर वो मुस्कुराते हुए कहती है "शुक्रिया शेह्जादे काँटों को मुरझाने का खौफ नहीं होता"

      नीरज


      Vaanbhatt ने कहा…
      ऊ ला ला...ये चैनल वाले भी उलटे-सीधे गीतों को इतना सुनते हैं...कि धीरे -धीरे पुराने गीतों के शौक़ीन भी इन्हें गुनगुनाने लगते है...भप्पी दा, जो ना सुनवाएं वो कम...लगता है भाभी जी ने मूवी नहीं देखी...वर्ना नए साल में चाय भी ना मिलती...



      चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...
      काश! यह स्क्रिप्ट रामगोपाल वर्मा देख लेता तो असफलता का मुंह तो न देखना पड़ता :)
      दीपक बाबा said...
      पता नहीं ... नहीं जानता ..

      लेकिन एक बात जानना चाहता हूँ,

      गब्बर कब मरेगा..
      शोले कब खत्म होगी..

      कोई नहीं जानता..
      यही इस फिल्म की विशेषता है..
      हर देश काल में फिट बैठती है..

      बदिया लगया व्यंग.
      साधुवाद.
      प्रवीण पाण्डेय said...
      बाप अभी तक ऑर्कुट पर, क्या जमाना आ गया है..
      गिरीश said...
      ट्वीटरगढ़ के शोले ... यह पोस्ट आप को अपने सारे ट्विटर फालोअर्स
      को समर्पित करना चाहिये ..जो लोग ट्विटर के चाल चलन से
      परिचित हैं, वो कही न कही अपने आप को खोजेगे इस पोस्ट में..
      .....आनंद आ गया|
      अतुल प्रकाश त्रिवेदी said...
      वाह मिश्रा जी दूसरी बार किसी ब्लॉग पर शोले की नई पटकथा पढ़ रहा हूँ . वैसे भी आपका हक है सलीम-जावेद की तर्ज़ पर आपका ब्लॉग भी शिव-ज्ञान की जोड़ी शैली में है.

      मैं तो सोचता ही रहा की त्वरितर पर हिन्दी ब्लॉगवाले सक्रिय हूँ . पंचम जी तो एक ट्वीट कर वापस ही नहीं आये . और अब जब आपने त्वरितर का इतना महात्म्य लिख दिया और यहाँ इतने बड़े बड़े त्वरितर की परिभाषा के अनुसार हिंदीब्लॉग के सेलेब्रिटी हैं तो अवश्य अब आप और ज्ञान जी की तरह और भी हिंदी के सेलेब्रिटी Occupy Twitter कर लेंगे
      भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...
      ये तो कालजयी है.
      Abhishek Ojha said...
      वाह वाह ! गजब है ये तो.
      अनूप शुक्ल said...
      क्या बात है! इस पर तो पूरी पिक्चर बननी चाहिये। :)


      चलिए आज तो टिप्पणियां का टोकरिया आपके हवाले डायरेक्टली कर दिए हैं , लेकिन कल से ......जी बिल्कुल ठीक समझे

      टिप्पी पर टिप्पा धरेंगे .......जय जय सिया राम ।

    शनिवार, 31 दिसंबर 2011

    टिप्पणियां आपकी , आपके लिए

    जी हां , आइए इसे प्रोत्साहित करें
    जैसा कि कल की पोस्ट पर मैंने कहा था कि , अब इस मंच से हमारा प्रयास होगा कि ब्लॉगजगत में की जा रही टिप्पणियों को सहेज़ कर हम आपके लिए लेकर आएंगे ताकि टिप्पणियों का खोता आकर्षण और पोस्टों में टिप्पणियों को प्रोत्साहन मिल सके । आज की कुछ टिप्पणियां ये रहीं :-

    धान के देश में की इस पोस्ट पर :-

    भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...
    उगते सूरज को सभी सलाम करते हैं

    दफ़्‌अतन  की इस पोस्ट पर


    इमरान अंसारी said...

    आपने कुछ कहने लायक छोड़ा ही नहीं है.........बस हैट्स ऑफ कर सकता हूँ आपको.........आपकी भाषा और पोस्ट की रवानगी......इसमें छिपी अग्नि की ललक.........सुभानाल्लाह |



    निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...
    बहुत मजाकिया. क्या आपको बरसों पहले दूरदर्शन पर आनेवाली डीडी'ज कॉमेडी शो की याद है?




    varun says:
    तुम्हारे लेखों में जिस frequency से ‘वरुण’ नाम के इस लड़के का ज़िक्र आता है उससे ज्यादातर लोग यही मानेंगे कि वो तुम्हारा बनाया हुआ कोई ‘fictional character’ है जिसके साथ हो रही घटनाओं का सहारा लेकर तुम अपनी theory रखते हो. :)
    और ‘Ides of March’ मुझे तो लगा शुरू होने से पहले ही खतम हो गयी. मेरे लिए पूरी फिल्म ‘फूल और काँटे’ के अजय देवगन की मोटरसाइकल एंट्री वाले सीन के बराबर ही थी जहाँ बस यही establish किया गया कि “देख लो भई…अपना हीरो कितना बवाल है.” उसके बाद ये बवाल आदमी क्या करेगा ये तो दिखाया ही नहीं.





    शिवम् मिश्रा said...
    श्यामू भाई ... इन सब फोटो का तो बड़ी बेसब्री से इंतज़ार था सब को ... बहुत बहुत आभार इनको साँझा करने के लिए !

    आपको सपरिवार नव वर्ष २०१२ की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं !


    चिट्ठाचर्चा की इस पोस्ट पर :-



    वाह क्या स्टाईल है चिट्ठाचर्चा का साल बीतते बीतते …..नए साल पर नयी नयी ऐसी ही स्टायिलें सूझें ….चिट्ठाचर्चा और चिट्ठाचर्चाकारों को बहुत बहुत शुभकामनाएं!





    Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...
    आपके आलेख के किसी भी बिन्दु से असहमत होने का प्रश्न ही नहीं उठता। भ्रष्ट शक्तिशाली अधिकारी अपने आधिकारिक बल के द्वारा अपने स्वार्थ को हर प्रकार के व्यक्ति पर थोपता है। गिने-चुने लोग ऐसे भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जंग भी लड़ते हैं परंतु अलग-थलग पड़ जाते हैं। कुछ लोग मजबूरी में भ्रष्टाचार को हवा देते हैं जबकि अपराधी प्रवृत्ति के लोग ऐसी बुराइयों के साथ मिलकर फ़ायदा उठाते हैं। दुख यह है कि कई बार ईमानदार लोग भी अज्ञानवश ऐसे लोगों के भ्रष्ट अचीवमेंट्स का विरोध करने के बजाय बधाई देने और उनकी हार पर मानवतावश सहानुभूति करने पहुँच जाते हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई तभी लड़ी जा सकती है जब सज्जन वर्ग न केवल सशक्त और संगठित हो वह यह भी पहचाने कि अपने फ़ायदे के लिये ईमानदारी का राग अलापने वाला हर व्यक्ति भी ईमानदार नहीं होता। बहुत सुन्दर आलेख। आपके मन की व्यथा लाखों ईमानदारों की व्यथा है।



    Dr.J.P.Tiwari ने कहा…
    यह राष्ट्र हमारा
    अमर रहे.
    गणतंत्र रहे,
    स्वतंत्र रहे...
    यही एक
    अपेक्षा अपनी,
    आनेवाले इस
    नए वर्ष से.
    अपने प्यारे देश,
    भारत वर्ष से.
    परन्तु कभी न
    स्व' का 'तंत्र' रहे.
    हाँ! कभी न
    स्व' का 'तंत्र' बने.



    Rahul Singh said...
    एक साथ पढ़ कर तो ओवरडोज जैसा ही लगा अब, जारी रहे यह सफर.

    शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

    आइए टिप्पणियां पढें




    पिछले कुछ समय में अक्सर अंतर्जालीय मित्रों के बीच एक बात बार बार उठी कि , हिंदी ब्लॉग जगत में पहले तो पाठकों की और अब टिप्पणी करने वाले पाठकों का रुझान कम हो रहा है । नहीं जानता कि ऐसा क्या सब महसूस कर रहे हैं । टिप्पणियों का आकर्षण और उनका अपना महत्व हमेशा से ही रहा है । इन टिप्पणियों को सहेज कर बटोर कर बीच बीच में पाठकों के सामने एक नए अंदाज़ से लाने के लिए ही टिप्पी पर टिप्पा लगाने की योजना बनाई थी । लगता है कि अब समय आ गया है कि इन्हें पुन: जीवित किया जाए । तो लीजीए आज से ही शुरू करते हैं । आज एक छोटी सी शुरूआत






    कुछ अलग सा की इस पोस्ट पर :-

    Pallavi ने कहा…
    आपकी बात सही है विज्ञापन बनाने वालों का तो फंडा ही यही है बस माल बिकना चाहिए किसी कि भावनाए आहात होती हैं तो होती रहें उनकी बला से ....हो सके तो इस विज्ञापन का लिंक लगाएँ देखने कि इच्छा है आभार.... समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है 

    देशनामा की इस पोस्ट पर :-

    वन्दना said...
    उफ़्……………आँख भर आई……………कुछ कहने को तो बचा हीनही……………सिवाय इसके माँ सिर्फ़ माँ होती है शायद ही कोई जान सकता है।


    अनूप शुक्ल ने कहा…
    किराये की भी चिंता थी। मैदान, दरी, तम्बू, कनात सबका तो चंदा देना होता न!


    अंतर्मंथन की इस पोस्ट पर :-


    Khushdeep Sehgal said...
    कहते हैं बुढ़ापे का इश्क भी गजब होता है...ऐसा ही गजब ढाया हमारे एक नवाब साहब ने...टीवी पर जिस तरह के सीरियल आजकल आते हैं...आप सब जानते हैं...सब घर वालों का साथ बैठकर इन्हें देखना मुश्किल होता है...नवाब साहब और बेगम घर पर अकेले थे...ऐसे ही एक रोमांटिक सीरियल पर नवाब साहब की नज़र पड़ गई...नवाब साहब को अपना गुजरा जमाना याद आ गया...नवाब साहब ने हिम्मत करके झट से बेगम को किस कर लिया...

    किस के बाद बेगम ने नवाब साहब से पूछा...क्या बबलगम खाई थी...

    नवाब साहब ने कहा...बबलगम तो थी...बस बबलगम का पहला 'ब' उड़ा दो... 



     चिट्ठाचर्चा की इस पोस्ट पर :-


    चिठ्ठाचर्चा अब अपना धर्म सही तरीके से निभाने लगा है। नये लोगों की चर्चा महत्वपूर्ण अंग है धर्म का।
    अब बेपटरी न हो! :-)


    शुक्रिया! वैसे पटरी-बेपटरी होना भी चिट्ठाचर्चा के सहज-स्वभाव में है। देखिये आगे आपकी मंशा कैसे पूरी कर पाते हैं। :)


    हुंकार की इस पोस्ट पर :-



    हा हा हा लिट्टीबाज अय्याश निकले आप तो हो । बाबूजी , मां और दादी तक का करेजा जरा के खाक कर दिए । लेकिन एतना से क्या होगा , अरे बियाह करिए बियाह । चईन पर जब चूडा कुटाएगा न त लिट्टी त लिट्टी चोखा भी आउर चोखा लगेगा । फ़ोटो देख के मन हुलस गया हो । दबा के खाए न




    मैं घुमन्तु की इस पोस्ट पर :-

    Arvind Mishra said...
    हे भगवान लहरें के बाद यहाँ भी! येट टू ब्रूटस:)


    कल्पतरू की इस पोस्ट पर :-


    Praveen Trivedi said...
    इसीलिये कहता हूँ कि ट्रायल और इरर सबसे अच्छा "गुरु" होता है !


    आपके अंदर के 'गुरुत्व' को सलाम !


    मेरी भावनाएं की इस पोस्ट पर :-

    Suman ने कहा…
    नव वर्ष की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनायें !
    सार्थक सन्देश देती रचना ....
    अक्सर यह मन संकल्प तोड़ने में बड़ा माहिर है !
    संकल्प नहीं समझ चाहिए बस !




    रविवार, 27 मार्च 2011

    और ये रही आज की टिप्पणियां ..off course हमारे टिप्पे के साथ ...झा जी का टिप्पा











    आज जबकि बहुत दिनों बाद फ़िर से टिप्पणियों की याद आई , मतलब ये कि मैंने टिप्पणियों को याद किया उनके बारे में सोचा और ब्लॉग बकबक पर इस बात का ज़िक्र भी किया  है कि टिप्पणियों को सहेजने के लिए अलग












    खुशदीप भाई की इस पोस्ट पर


    दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
    छिछोरिऑन तो सर्वव्यापक है। पदार्थ के कान्स्टीट्यूएंट (त्रिगुण) में से एक है। रजोगुण कहते हैं शायद उसे। पदार्थ के प्रत्येक कण में वह विराजमान है। बस कभी उस की अभिव्यक्ति होती है कभी नहीं होती।
    डॉ टी एस दराल said...
    साहित्य के लिए सैंकड़ों द्वार हैं । लेकिन अभिव्यक्ति के लिए बस ब्लोगिंग ही है जो सब को निशुल्क , निर्विरोध , २४ अवर्स इ डे , सेवेन डेज इ वीक उपलब्ध है । यह तो विचारों का एक गुल्लक है । जितना चाहे , अपनी पसंद और सामर्थ्य अनुसार , डालते रहो ।
    डा. अमर कुमार said...
    . फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं.... ! यह विषय टिप्पणी में समेटने वाला नहीं है । शायद आपने मॉडरेशन हटा दिया है, आशा है इसका कारण मेरा आग्रह न रहा हो ! बात अपनी औ तुम्हारी साँझी पीड़ा जो हमारी। वो स्वरों को खोलकर, जाँचना सब चाहते हैं, भाव उठ, बह चले जो, बाँचना सब चाहते हैं, कर्म है उनका यही तो इस कर्म का अधिकार दे दो संग ही मेरे हृदय के मर्म का आधार दे दो ।। यह क्या है... साहित्य या महज़ ब्लॉगरीय अभिव्यक्ति ? यदि कमलेश्वर को बीच में घसीटा जाये तो उनके लिखे अनुसार.. "इन कफ़स की तीलियों से छन रहा है कुछ नूर - सा कुछ फज़ा कुछ हसरते परवाज़ की बातें करो... " कहीं दर्ज़ हो जाने के बाद यही फ़ज़ा और हसरते परवाज़ साहित्य कहलायेगा । यही शख़्स कहीं आगे लिखता है.. "इन बंद कमरों में मेरी साँस घुटी जाती है खिड़िकियाँ खोलता हूँ तो ज़हरीली हवा आती है" यह छटपटाहट सामयिक सँदर्भों की ब्लॉगिंग कही जा सकती है । अब सवाल यह है कि, यदि साहित्य समाज का दर्पण है... और इस दर्पण में आप अपनी तस्वीर तो देख ही सकते हैं, साथ ही दुनिया को भी आइना दिखा सकते हैं.. तो इस नाते ब्लॉगिंग क्या हुई... उन्मुक्त अभिव्यक्ति की एक साहित्यिक विधा या माध्यम... ? यह आप पर है कि, इसे अपनी सुविधानुसार आप जो भी कहना चाहें !
    देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…
    ..ई झाड़ बनारसी का होत है? सांड़ बनारसी से नहीं मिले का ? ..सदियों पुरानी माया, सदियों पुराना बुढ़ौना । फर्क है तो सिर्फ नवकी पतोहिया के दर्द का। कहीं कहीं तो नवकी पतोहिये दर्द दे रही हैं नवके भतार को।
    प्रवीण पाण्डेय ने कहा…
    घर के बुढ़ौना में उमंग की आस, जीवन अतृप्त, प्रतीक्षा की प्यास।
    सतीश पंचम ने कहा…
    जियो करेजा जियो....एकदम मन हिलोर :)